
नई दिल्ली- संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत की जीडीपी वृद्धि 2026 में 6.6 प्रतिशत और 2027 में 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह वृद्धि मजबूत घरेलू खपत और सशक्त सार्वजनिक निवेश के सहारे संभव होगी, जो अमेरिका द्वारा लगाए गए उच्च शुल्क (टैरिफ) के नकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक संतुलित कर देगी।
‘वर्ल्ड इकोनॉमिक सिचुएशन एंड प्रॉस्पेक्ट्स 2026’ रिपोर्ट में कहा गया है कि हालिया कर सुधारों और मौद्रिक नीति में ढील से निकट भविष्य में अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त समर्थन मिलने की उम्मीद है।
रिपोर्ट में कहा गया, “चीन, भारत और इंडोनेशिया सहित कई बड़े विकासशील देशों में घरेलू मांग की मजबूती या लक्षित नीतिगत उपायों के चलते ठोस आर्थिक वृद्धि जारी रहने की संभावना है।”
दक्षिण एशिया के लिए आर्थिक परिदृश्य अपेक्षाकृत मजबूत बना हुआ है। हालांकि, क्षेत्र की वृद्धि दर 2025 में अनुमानित 5.9 प्रतिशत से घटकर 2026 में 5.6 प्रतिशत रहने की संभावना है, लेकिन 2027 में इसके फिर से 5.9 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान जताया गया है।
रिपोर्ट में आगे कहा गया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था ने लचीलापन दिखाया है, लेकिन व्यापारिक तनाव, राजकोषीय दबाव और लगातार बनी अनिश्चितता के कारण भविष्य का परिदृश्य अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
यूएन रिपोर्ट के अनुसार, “2026 में वैश्विक आर्थिक वृद्धि के 2.7 प्रतिशत तक धीमी होने का अनुमान है, जो 2025 के स्तर और महामारी-पूर्व औसत से कम है। निवेश में सुस्ती और संरचनात्मक बाधाएं, महंगाई में नरमी और मौद्रिक नीति में ढील के बावजूद, गति पर असर डाल रही हैं।”
जहां अमेरिका और एशिया के कुछ हिस्सों में घरेलू मांग और नीतिगत राहत से आर्थिक गतिविधियों को सहारा मिल रहा है, वहीं यूरोप में वृद्धि कमजोर बनी हुई है। इसके अलावा, उच्च कर्ज और जलवायु संबंधी झटके कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की प्रगति को सीमित कर रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया कि 2025 में वैश्विक व्यापार उम्मीद से बेहतर रहा, जिसका कारण उच्च शुल्क लागू होने से पहले की गई अग्रिम आपूर्ति और सेवाओं के मजबूत निर्यात रहे। हालांकि, 2026 में व्यापार वृद्धि के धीमे पड़ने का अनुमान है, क्योंकि अस्थायी कारक कमजोर होंगे और व्यापार बाधाएं व नीतिगत अनिश्चितता बनी रहेंगी। अधिकांश क्षेत्रों में निवेश भी सुस्त बना हुआ है।
वैश्विक स्तर पर प्रमुख महंगाई दर 2025 में 3.4 प्रतिशत से घटकर 2026 में 3.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसके बावजूद, ऊंची कीमतें वास्तविक आय को प्रभावित कर रही हैं, खासकर निम्न-आय वर्ग के परिवारों पर इसका अधिक असर पड़ रहा है। भोजन, ऊर्जा और आवास की लागत असमानता और दबाव का बड़ा कारण बनी हुई है।
रिपोर्ट में जोर देते हुए कहा गया, “लगातार बनी मूल्य वृद्धि से निपटने के लिए केवल मौद्रिक नीति पर्याप्त नहीं है। महंगाई को स्थिर करने, निवेश को बढ़ावा देने और कमजोर वर्गों की रक्षा के लिए मौद्रिक, राजकोषीय और औद्योगिक नीतियों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। लक्षित और अस्थायी उपायों से परिवारों को ऊंची कीमतों से राहत दी जा सकती है, जबकि विश्वसनीय मध्यम अवधि की राजकोषीय योजनाएं और विवेकपूर्ण ऋण प्रबंधन से वित्तीय क्षमता को फिर से मजबूत किया जा सकता है।”
With inputs from IANS