





नई दिल्ली: भारत का घरेलू किराना बाजार वित्त वर्ष 2030 तक बढ़कर लगभग 992 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। हालांकि, देश में अब भी करीब 91 प्रतिशत किराना खरीदारी पारंपरिक दुकानों (किराना स्टोर्स) के माध्यम से ही होती है, जिससे डिजिटल ग्रॉसरी कारोबार के लिए बड़ी संभावनाएं बनी हुई हैं। यह जानकारी शुक्रवार को जारी Redseer की एक रिपोर्ट में दी गई।
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2030 तक भारत के 15 करोड़ से अधिक परिवार हर साल एक ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का उपभोग करेंगे, जिसमें सबसे बड़ा खर्च किराना पर होगा। इसके बावजूद वर्तमान में ई-कॉमर्स की हिस्सेदारी कुल किराना बाजार में केवल लगभग 3 प्रतिशत है।
रिपोर्ट का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह हिस्सेदारी बढ़कर करीब 7 प्रतिशत हो सकती है, जिसे भारतीय रिटेल इतिहास में मांग के सबसे बड़े विस्तारों में से एक माना जा रहा है।


भारत का कुल किराना बाजार 658 अरब डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2030 तक 992 अरब डॉलर तक पहुंचने की राह पर है, जिसमें 8 प्रतिशत से अधिक की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) रहने का अनुमान है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले वर्षों में किराना कारोबार की वृद्धि केवल महानगरों की रणनीति को टियर-2 और टियर-3 शहरों में लागू करने से नहीं होगी। सफलता उन्हीं कंपनियों को मिलेगी जो भारतीय उपभोक्ताओं की जरूरतों के अनुसार अपने उत्पाद, कीमत और वितरण प्रणाली में बदलाव करेंगी।
रिपोर्ट के मुताबिक, उपभोक्ता अब ब्रांडेड, पैकेज्ड और अपेक्षाकृत स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं। साथ ही क्षेत्रीय पसंद के अनुरूप उत्पाद, छोटे पैक और किफायती कीमतें उनकी प्रमुख मांग बनती जा रही हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि एक बड़े 'वैल्यू ग्रॉसरी' प्लेटफॉर्म के पास लगभग 278 क्षेत्रीय और प्राइवेट-लेबल ब्रांड हैं, जो पारंपरिक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की तुलना में तीन गुना से अधिक है। इसके कुल उत्पादों (SKU) में करीब 58 प्रतिशत क्षेत्रीय या प्राइवेट-लेबल ब्रांड हैं, जबकि पारंपरिक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर यह आंकड़ा केवल 18 से 20 प्रतिशत के बीच है।


रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्रीय उत्पादों, प्राइवेट लेबल और कम लागत वाली डिलीवरी पर आधारित 'वैल्यू ग्रॉसरी' मॉडल तेजी से उभर रहा है। यही मॉडल भारत के अगले 10 करोड़ ऑनलाइन ग्राहकों को डिजिटल कॉमर्स से जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वर्ष 2030 तक भारत के परिवार हर साल लगभग एक ट्रिलियन डॉलर मूल्य के सामान और सेवाओं की खपत करेंगे। इनमें मुख्य रूप से टियर-2, टियर-3 शहरों, कस्बों और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रहने वाले निम्न-मध्यम आय वर्ग के 15 करोड़ से अधिक परिवार शामिल होंगे, जिनकी वार्षिक खर्च क्षमता लगभग 4 से 5 प्रतिशत की दर से लगातार बढ़ने की उम्मीद है।
With inputs from IANS
