

नई दिल्ली। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) की निकासी में कमी और रुपये आधारित परिसंपत्तियों के आकर्षक मूल्यांकन के कारण भारत की व्यापक आर्थिक स्थिति (मैक्रो इकोनॉमी) और विकास की संभावनाएं पहले से अधिक मजबूत हुई हैं। डीएसपी की एक रिपोर्ट में यह आकलन किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) आगे भी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए पर्याप्त तरलता (लिक्विडिटी) उपलब्ध कराता रहेगा। इससे बॉन्ड प्रतिफल (यील्ड) में धीरे-धीरे कमी आने की संभावना है। साथ ही, उत्पादन क्षमता का बेहतर उपयोग और मांग में सुधार आर्थिक विकास को नई गति दे सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्थिक गतिविधियों, खासकर नाममात्र की वृद्धि (नॉमिनल ग्रोथ) में सुधार से भारतीय कंपनियों की बिक्री में भी तेजी आने की उम्मीद है।
डीएसपी का मानना है कि वित्त वर्ष 2026-27 में भुगतान संतुलन (बैलेंस ऑफ पेमेंट), जिसे पहले बाजार के लिए चिंता का विषय माना जा रहा था, अब अर्थव्यवस्था की मजबूती का आधार बन सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, रुपये आधारित कई परिसंपत्तियां बेहतर प्रतिफल दे रही हैं। रुपये का वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (आरईईआर) ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर है, बड़ी कंपनियों के कई शेयर आकर्षक मूल्यांकन पर उपलब्ध हैं और एफपीआई का ऋण निवेश भी बढ़ रहा है। इन सभी कारणों से भारत की आर्थिक तस्वीर मजबूत दिखाई दे रही है।
मई 2026 में भारत का आरईईआर 88 से नीचे पहुंच गया, जो आमतौर पर केवल गंभीर आर्थिक दबाव के समय देखने को मिलता है। वहीं, भारत और अमेरिका के बीच महंगाई के अंतर में कमी आने से लंबी अवधि में रुपये के तेजी से कमजोर होने की आशंका भी कम हुई है।
शेयर बाजार को लेकर रिपोर्ट में बड़ी कंपनियों (लार्ज-कैप) के शेयरों को सबसे आकर्षक निवेश विकल्प बताया गया है। रिपोर्ट का कहना है कि यदि कंपनियों की आय में सुधार होता है, तो यही वर्ग बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, आर्थिक विकास में तेजी से ऋण वितरण और मांग दोनों में सुधार होगा। निर्माण गतिविधियों में बढ़ोतरी से सीमेंट उद्योग को भी लाभ मिलने की उम्मीद है और इस क्षेत्र की परिचालन क्षमता में सुधार देखने को मिल सकता है।
हालांकि सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) क्षेत्र के शेयर मूल्यांकन के लिहाज से सस्ते माने जा रहे हैं, लेकिन उनकी विकास दर को लेकर कुछ चिंताएं बनी हुई हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि उभरते बाजारों में मौजूदा तेजी मुख्य रूप से प्रौद्योगिकी क्षेत्र पर निर्भर है। दक्षिण कोरिया और ताइवान के कारण उभरते बाजार सूचकांक कुछ चुनिंदा क्षेत्रों और कंपनियों पर अधिक केंद्रित हो गया है। ऐसे में भारत इस समय उभरते बाजारों के बीच एक आकर्षक और अलग निवेश विकल्प के रूप में उभर सकता है।
With inputs from IANS