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भारत का रक्षा क्षेत्र घरेलू उत्पादन, स्वदेशी तकनीक और वैश्विक बाजार में विस्तार के नए दौर में प्रवेश कर रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में देश का रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड 1.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 15.6 प्रतिशत अधिक है।
एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2021 से 2026 के बीच रक्षा उत्पादन में करीब 18 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) दर्ज की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी खरीद के तरीके में बदलाव, निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी, स्वदेशी डिजाइन और तकनीकी क्षमताओं में सुधार तथा बड़े रक्षा कार्यक्रमों की बढ़ती संख्या इस विस्तार को गति दे रही है।
भारत के रक्षा निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2025-26 में रक्षा निर्यात 63 प्रतिशत बढ़कर करीब 38,000 करोड़ रुपये पहुंच गया। इससे वैश्विक रक्षा बाजार में भारत की बढ़ती भूमिका का संकेत मिलता है।
सरकार ने वित्त वर्ष 2028-29 तक रक्षा उत्पादन को 3 लाख करोड़ रुपये और रक्षा निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। फिलहाल भारत 80 से अधिक देशों को रक्षा उत्पादों का निर्यात करता है। अमेरिका, फ्रांस और आर्मेनिया इसके प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए सरकार ने पांच सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियां जारी की हैं, जिनमें 5,012 महत्वपूर्ण रक्षा वस्तुएं शामिल हैं। इनमें से 3,025 वस्तुओं का स्वदेशीकरण किया जा चुका है। इसके अलावा, सृजन पोर्टल के माध्यम से 38,000 से अधिक वस्तुओं को स्वदेशी बनाने के लिए चिन्हित किया गया है, जिनमें से 13,900 से अधिक का स्वदेशीकरण पूरा हो चुका है।
वित्त वर्ष 2026-27 के लगभग 1.4 लाख करोड़ रुपये के आधुनिकीकरण बजट में 75 प्रतिशत हिस्सा घरेलू उद्योग के लिए निर्धारित किया गया है। रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी भी बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2025-26 में निजी कंपनियों का योगदान कुल रक्षा उत्पादन का 24 प्रतिशत रहा, जो एक साल पहले 22 प्रतिशत था। इसका मूल्य करीब 42,000 करोड़ रुपये रहा।
वित्त वर्ष 2026-27 के रक्षा पूंजी अधिग्रहण बजट का करीब 25 प्रतिशत, यानी लगभग 34,700 करोड़ रुपये, निजी उद्योग के लिए निर्धारित किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी से रक्षा उद्योग में उनकी भूमिका भी बदल रही है। कंपनियां अब केवल सरकारी डिजाइन के अनुसार उपकरण बनाने वाले पारंपरिक ‘बिल्ड-टू-प्रिंट’ मॉडल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ‘बिल्ड-टू-स्पेसिफिकेशन’, ‘बिल्ड-टू-डिजाइन’ और ‘बिल्ड-टू-रिक्वायरमेंट’ जैसी क्षमताओं की ओर बढ़ रही हैं।
कई निजी कंपनियां लीड सिस्टम इंटीग्रेटर के रूप में भी अपनी क्षमता विकसित कर रही हैं। इससे उन्हें जटिल रक्षा प्लेटफॉर्म के डिजाइन, सिस्टम इंटीग्रेशन और अंतिम डिलीवरी में अधिक व्यापक भूमिका निभाने का अवसर मिल रहा है।
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए रक्षा पूंजीगत व्यय करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 24 प्रतिशत अधिक है। इससे तीनों सेनाओं के लिए विभिन्न आधुनिक रक्षा प्रणालियों की खरीद और विकास से जुड़ी बड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
भारतीय वायुसेना के लिए मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट, एलसीए तेजस एमके-2, सुखोई-30 एमकेआई के अपग्रेड, मध्यम परिवहन विमान, अतिरिक्त एस-400 प्रणालियां और एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट जैसी परियोजनाएं आगे बढ़ रही हैं।
थलसेना की प्रमुख परियोजनाओं में फ्यूचर इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल, फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल, के9 वज्र-टी, क्यूआरएसएएम, आकाश-एनजी, लोइटरिंग म्यूनिशन, हेलीकॉप्टर और अगली पीढ़ी की पिनाका प्रणालियां शामिल हैं।
नौसेना भी प्रोजेक्ट-75आई, अतिरिक्त स्कॉर्पीन पनडुब्बियों, अगली पीढ़ी के फ्रिगेट, नौसैनिक यूटिलिटी हेलीकॉप्टर, मानवरहित अंडरवाटर व्हीकल और स्वदेशी विमानवाहक पोत आधारित लड़ाकू विमान जैसी परियोजनाओं पर काम कर रही है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड रक्षा उत्पादन हासिल होने और उत्पादन तथा निर्यात के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के साथ भारतीय रक्षा क्षेत्र अब केवल तत्काल सैन्य खरीद पर निर्भर नहीं रह गया है, बल्कि उसके सामने दीर्घकालिक संरचनात्मक विकास का अवसर है।