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सितंबर में भारतीय शेयर बाजार में तेज गिरावट के बाद अक्टूबर में भी कारोबार पर दबाव बने रहने की संभावना है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, इस महीने प्रमुख सूचकांक स्थिर रह सकते हैं या कुछ और कमजोरी देख सकते हैं। सितंबर में निफ्टी करीब 6 प्रतिशत गिरा, जबकि लगातार आठ सप्ताह की गिरावट ने इसके कमजोर प्रदर्शन की अवधि को 25 साल में सबसे लंबा बना दिया।
विशेषज्ञों के मुताबिक, ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, मजबूत डॉलर, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और रुपये में कमजोरी जैसे वैश्विक कारक अक्टूबर में भी भारतीय बाजार के लिए प्रमुख चुनौतियां बने रह सकते हैं।
हालांकि, अक्टूबर में बाजार को कुछ सहारा मिलने की उम्मीद है। त्योहारी मांग, सरकारी खर्च और कंपनियों के दूसरी तिमाही के नतीजों का सीजन शुरू होने से बड़े बैंकों, चुनिंदा विनिर्माण कंपनियों और घरेलू खपत से जुड़ी कंपनियों में गतिविधियां बढ़ सकती हैं। इसके बावजूद विदेशी निवेशकों की ओर से मजबूत खरीदारी लौटने में अभी समय लग सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगले तीन महीनों में बाजार की टिकाऊ रिकवरी केवल घरेलू मांग पर निर्भर नहीं करेगी। इसके लिए कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में स्थिरता महत्वपूर्ण होगी।
सितंबर के दौरान निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में दबाव देखने को मिला। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, रुपये पर दबाव और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में वृद्धि ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया।
सप्ताह के दौरान निफ्टी में लगातार चार कारोबारी सत्रों में गिरावट दर्ज की गई और गुरुवार को यह 3.1 प्रतिशत की साप्ताहिक गिरावट के साथ 22,422 अंक पर बंद हुआ।
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की बिकवाली भी बाजार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। बीते सप्ताह विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में करीब 34,970 करोड़ रुपये की बिकवाली की। सितंबर में भी FII लगातार बिकवाल रहे और इससे उनके सालाना शुद्ध आउटफ्लो का आंकड़ा 2.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया। इसके साथ ही विदेशी निवेशकों की दो महीने की खरीदारी का सिलसिला भी समाप्त हो गया।
विशेषज्ञों के अनुसार, घरेलू संस्थागत निवेश और अन्य घरेलू पूंजी बाजार में गिरावट को कुछ हद तक सीमित कर सकते हैं, लेकिन यदि विदेशी बिकवाली लंबे समय तक जारी रहती है तो बाजार में मजबूत और टिकाऊ रिकवरी मुश्किल हो सकती है।
कई बाजार विश्लेषकों को दिसंबर तक कुछ सुधार की उम्मीद है और उनका मानना है कि बड़ी कंपनियों के शेयर इस संभावित रिकवरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, निवेशकों के लिए कंपनियों की वास्तविक कमाई, उचित मूल्यांकन और मजबूत बैलेंस शीट जैसे बुनियादी पहलुओं पर ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा।
मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी कमाई में सुधार आने में अधिक समय लग सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, दूसरी तिमाही के वित्तीय नतीजे बाजार की आगे की दिशा के लिए महत्वपूर्ण संकेत देंगे। निवेशक कंपनियों की बिक्री वृद्धि, मार्जिन और प्रबंधन के भविष्य के कारोबार संबंधी अनुमान पर विशेष नजर रखेंगे।
इसके अलावा, देश के कुछ हिस्सों में कमजोर मानसून की स्थिति भी बाजार की धारणा को प्रभावित कर सकती है, खासकर उन क्षेत्रों में जिनका प्रदर्शन ग्रामीण मांग और कृषि आय से जुड़ा है।
कुल मिलाकर, अक्टूबर में घरेलू आर्थिक गतिविधियों से बाजार को कुछ सहारा मिलने की संभावना है, लेकिन वैश्विक ब्याज दरों, डॉलर, कच्चे तेल और विदेशी पूंजी के रुख से बाजार की दिशा पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।