
मुंबई: फिल्मों में महिलाओं के चित्रण और ऑब्जेक्टिफिकेशन को लेकर चल रही बहस के बीच अभिनेत्री Madhoo ने कहा है कि 1991 की सुपरहिट फिल्म Phool Aur Kaante में छेड़छाड़ (ईव-टीजिंग) को रोमांस के रूप में पेश किया गया था, लेकिन आज के दौर में ऐसी चीजें स्वीकार नहीं की जाएंगी।
IANS से खास बातचीत में मधु ने कहा कि सिनेमा हमेशा समाज की सोच और बदलती संवेदनशीलताओं के साथ विकसित होता है। उन्होंने माना कि 80 और 90 के दशक में फिल्मों में कई ऐसे दृश्य सामान्य माने जाते थे, जिन्हें आज के समय में गलत और आपत्तिजनक माना जाता है।
उन्होंने कहा कि उस दौर में फिल्मों में दुष्कर्म के दृश्य आम बात थे और लगभग हर फिल्म में ऐसे दृश्य शामिल किए जाते थे। उस समय इन पर ज्यादा सवाल नहीं उठाए जाते थे। मधु ने बताया कि वह खुद भी एक ऐसी फिल्म का हिस्सा रही हैं, जिसमें इस तरह का दृश्य फिल्माया गया था। हालांकि आज ऐसी घटनाओं को फिल्मों में दिखाने का तरीका काफी बदल चुका है और इन्हें अधिक संवेदनशीलता के साथ पेश किया जाता है।
अपनी फिल्म फूल और कांटे का उदाहरण देते हुए मधु ने कहा कि फिल्म के शुरुआती हिस्से में नायक द्वारा नायिका का पीछा करना, सीटी बजाना और उसे परेशान करना रोमांस के रूप में दिखाया गया था।
उन्होंने कहा, “फिल्म के पहले दो गाने पूरी तरह ईव-टीजिंग पर आधारित थे। कॉलेज कैंपस में लड़के पीछा करते हैं, सीटी बजाते हैं और उस समय इसे रोमांस माना जाता था। कहानी में मेरा किरदार उसी लड़के से प्यार करने लगता है जो उसे परेशान कर रहा होता है। लेकिन आज अगर कोई लड़का कॉलेज में ऐसा करे तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है।”
मधु ने कहा कि 90 के दशक में दर्शकों ने इस तरह के चित्रण को मनोरंजन और प्रेम कहानी के हिस्से के रूप में स्वीकार किया, जबकि आज समाज की सोच बदल चुकी है।
उन्होंने कहा, “अगर आज फिल्मों में ऐसी हरकतों को आकर्षक या रोमांटिक बनाकर दिखाया जाए, तो यह युवाओं को गलत संदेश दे सकता है। छेड़छाड़ को प्यार या रोमांस नहीं कहा जा सकता। यह उत्पीड़न है। लेकिन यही चीज उस समय की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में शामिल थी और मैं भी उस फिल्म का हिस्सा थी। तब किसी ने इसकी आलोचना नहीं की, बल्कि फिल्म को खूब सराहा गया।”
अभिनेत्री ने कहा कि सिनेमा समाज का प्रतिबिंब होता है और जैसे-जैसे समाज बदलता है, वैसे-वैसे फिल्मों की भाषा, विषय और प्रस्तुति भी बदलनी पड़ती है।
मधु ने निष्कर्ष में कहा, “समाज में जिस तरह की बातचीत और जागरूकता बढ़ती है, सिनेमा को भी उसी के अनुरूप खुद को बदलना होता है। आखिरकार, फिल्में हमारे समाज का ही आईना होती हैं।”
With inputs from IANS