
मुंबई। अभिनेत्री लिसा रे ने उम्र बढ़ने, खूबसूरती के बदलते मानकों और महिलाओं पर हमेशा जवां और आकर्षक दिखने के दबाव को लेकर खुलकर बात की है। उन्होंने कहा कि समाज की ओर से लगातार रूप-रंग और उम्र को लेकर तय की जाने वाली अपेक्षाएं महिलाओं के भीतर एक तरह की स्थायी बेचैनी पैदा कर सकती हैं।
‘फोर मोर शॉट्स प्लीज!’ में नजर आ चुकीं लिसा रे ने इंस्टाग्राम पर साझा किए एक नोट में अपने अनुभवों को याद किया। उन्होंने बताया कि किशोरावस्था के अंतिम वर्षों में उन्होंने नाओमी वुल्फ की चर्चित किताब ‘द ब्यूटी मिथ’ पढ़ी थी। लिसा के मुताबिक, फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखने वाली एक युवती के लिए यह किताब ऐसे समय में मिली, जब वह पहले से ही समझ रही थीं कि महिलाओं के रूप-रंग को लेकर समाज की राय कितनी मजबूत होती है।
उन्होंने लिखा कि इस किताब ने उन्हें उन डर और असुरक्षाओं को समझने के लिए शब्द दिए, जिन्हें वह पहले से महसूस करती थीं। इनमें उम्र बढ़ने, वजन बढ़ने, झुर्रियां, सफेद बाल, शरीर पर सेल्युलाईट और आकर्षक बने रहने का दबाव शामिल है।
लिसा ने अपने पोस्ट में एक उद्धरण साझा किया, जिसमें कहा गया था कि अगर महिलाएं एक दिन उठकर अपने शरीर को पसंद करने लगें, तो कई उद्योगों का कारोबार प्रभावित हो सकता है।
इसके साथ उन्होंने लिखा कि डर कारोबार के लिए बेहद प्रभावी हथियार है—उम्र बढ़ने का डर, वजन बढ़ने का डर, झुर्रियों और शरीर में बदलाव का डर और इस बात का डर कि कहीं कोई दूसरी महिला खुद को आपसे बेहतर तरीके से ‘महिला’ साबित न कर रही हो।
अभिनेत्री ने कहा कि इस पूरे दबाव का सबसे थका देने वाला हिस्सा केवल वे चीजें नहीं हैं, जिन्हें महिलाएं इस डर की वजह से खरीदती हैं, बल्कि वह लगातार बनी रहने वाली मानसिक बेचैनी है, जो उन्हें यह महसूस कराती रहती है कि उनमें कुछ न कुछ कम है।
उन्होंने इसे इस तरह समझाया कि महिलाएं खुद को बार-बार यह सोचने पर मजबूर पाती हैं कि वे पर्याप्त रूप से पतली, जवान, चिकनी त्वचा वाली, आकर्षक या अनुशासित नहीं हैं।
लिसा ने यह भी स्वीकार किया कि उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा उन्हीं उद्योगों के बीच बिताया है, जो इन सौंदर्य मानकों को बढ़ावा देते हैं। इसलिए वह खुद को इससे पूरी तरह अलग या नैतिक रूप से श्रेष्ठ नहीं मानतीं।
उन्होंने कहा कि उन्हें सौंदर्य मानकों से फायदा भी मिला है और उन्होंने खुद भी कई बार उन्हें अपनाया है, लेकिन दूसरी ओर इन्हीं मानकों ने उन्हें कमतर महसूस भी कराया है।
हालांकि, लिसा के मुताबिक उम्र बढ़ने के साथ नजरिया बदलने लगता है। उन्होंने कहा कि मिडलाइफ का एक खूबसूरत पहलू यह है कि बचपन और युवावस्था से चली आ रही कई धारणाएं धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती हैं और व्यक्ति इस पूरे खेल को पहचानना शुरू कर देता है।
54 वर्षीय अभिनेत्री ने कहा कि अब उनकी प्राथमिकता अपने शरीर को बदलने या उसकी कमियों को सुधारने के बजाय उसमें सहज होकर जीना है। वह शरीर को मजबूत बनाने, उसकी बात सुनने, उसका आनंद लेने और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को स्वीकार करने पर अधिक ध्यान देती हैं।
लिसा ने महिलाओं से स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने, अपने शरीर को समझने, शारीरिक और मानसिक मजबूती पर ध्यान देने तथा अपनी भावनाओं और जरूरतों को सुनने की अपील की। उन्होंने कहा कि अगर महिलाएं हर सुबह खुद को सुधारने वाली किसी ‘समस्या’ के रूप में देखना बंद कर दें और अपने जीवन के हर खूबसूरत, अपूर्ण पल को स्वीकार करते हुए जीना शुरू कर दें, तो यह एक बड़ा बदलाव होगा।
उन्होंने अपने विचार को हल्के-फुल्के अंदाज में समाप्त करते हुए कहा कि ऐसा बदलाव शायद काफी ‘डिसरप्टिव’ होगा—और संभव है कि कॉरपोरेट कंपनियों की तिमाही बिक्री के लिए भी यह अच्छी खबर न हो।
With inputs from IANS