
रांची: मत्स्य निदेशालय ने राज्य के जलाशयों में Macrobrachium rosenbergii (स्थानीय नाम महाझींगा) के पालन को बढ़ावा देने के लिए एक नई पहल शुरू की है। यह कदम कृषि, पशुपालन (मत्स्य) एवं सहकारिता मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की के मार्गदर्शन में उठाया गया है, जिसका उद्देश्य जनजातीय समुदायों की आजीविका को मजबूत करना है।
इस कार्यक्रम को आईसीएआर-सीआईएफआरआई, बैरकपुर (कोलकाता) के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. अर्चन कांती दास के तकनीकी सहयोग से लागू किया जा रहा है। मत्स्य निदेशालय के निदेशक अमरेंद्र कुमार के अनुसार, छोटे जलाशयों में पारंपरिक मछली पालन के साथ महाझींगा पालन जोड़ने से स्थानीय मछुआरों की आय और जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।
पहले महाझींगा पालन झारखंड के तीन जलाशयों—हजारीबाग का घाघरा, सिमडेगा का केलाघाघ और गुमला का मसारिया—तक सीमित था, जहां इसके अच्छे परिणाम मिले। इन सफलताओं को देखते हुए अब जिला स्तर के अधिकारी इसे और अधिक जलाशयों तक विस्तार देने में रुचि दिखा रहे हैं।
हाल ही में इस योजना का विस्तार छह और जलाशयों तक किया गया है, जिनमें लातेहार का बछरा, रांची के करंजी और नौरंगा, लोहरदगा का नंदनी, गुमला का धन्सिंह और दुमका का बांकीबेरा शामिल हैं। 30 मार्च को दुमका के बांकीबेरा जलाशय में 2.34 लाख महाझींगा बीज डाले गए।
किसानों की सहायता के लिए विभाग ने चारा, मिनरल मिक्स और जियोलाइट जैसी आवश्यक सामग्री भी उपलब्ध कराई है। डॉ. दास ने बताया कि महाझींगा पालन से न केवल स्वरोजगार के अवसर बढ़ेंगे, बल्कि इसकी बढ़ती मांग और अच्छे बाजार भाव के कारण किसानों को अधिक आय भी होगी।
इस पहल को सफल बनाने में जिला मत्स्य पदाधिकारियों, विस्तार कर्मियों और स्थानीय जलाशय समितियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यह जानकारी मत्स्य निदेशालय के मुख्य निदेशक प्रशांत कुमार दीपक ने दी।