
खूंटी: झारखंड के खूंटी जिले से एक बार फिर “उलगुलान” की गूंज सुनाई देने लगी है। धरती आबा बिरसा मुंडा की कर्मभूमि माने जाने वाले इस क्षेत्र से शुरू हुए इस आंदोलन ने आदिवासी समाज के बीच नई चेतना का संचार किया है।
इस आंदोलन का नेतृत्व निशा उरांव कर रही हैं। उनके नेतृत्व में आदिवासी समाज के पाहन, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में स्थानीय लोग एकजुट होकर अपनी परंपरा, संस्कृति और अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आए हैं। आंदोलन में शामिल लोगों ने सामूहिक रूप से यह संकल्प लिया कि वे अपनी पहचान और सांस्कृतिक विरासत को हर हाल में सुरक्षित रखेंगे।
आंदोलन के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने खूंटी के उपायुक्त को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन के माध्यम से प्रशासन का ध्यान आदिवासी समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों की ओर आकर्षित कराया गया। आंदोलनकारियों का कहना है कि सरना समाज के लोगों को लंबे समय से अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसे अब संगठित रूप से उठाने की जरूरत है।
नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि सरना समाज मुख्यधारा से अलग नहीं होना चाहता, बल्कि उसी के भीतर रहकर अपने अधिकारों और परंपराओं की रक्षा करना चाहता है। उनका मानना है कि विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक अस्मिता का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है।
इस आंदोलन की खास बात यह है कि इसकी शुरुआत उसी ऐतिहासिक भूमि से हुई है, जहां से कभी बिरसा मुंडा ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ “उलगुलान” यानी महाविद्रोह का बिगुल फूंका था। आज उसी भूमि से एक बार फिर आदिवासी समाज अपनी पहचान, अधिकार और संस्कृति की रक्षा के लिए संगठित होकर आवाज बुलंद कर रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह आंदोलन सिर्फ एक मांग या विरोध नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने और आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है। आने वाले दिनों में इस आंदोलन के और व्यापक रूप लेने की संभावना जताई जा रही है।