
सुनील सिंह स्टेशन रांचीः धनबाद भाजपा में विवाद और गुटबाजी गंभीर होता चला जा रहा है. पार्टी के कार्यकर्ता और नेता आपस में ही लड़-भिड़ रहे हैं. यहां विरोधियों की जरूरत नहीं है. स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि महानगर अध्यक्ष श्रवण राय का पुतला दहन भाजपा कार्यकर्ताओं ने ही किया. राय ने झरिया विधायक रागिनी सिंह के खिलाफ बयान दिया था. आरोप लगाया था. इससे नाराज कार्यकर्ताओं ने अध्यक्ष के खिलाफ जमकर नारेबाजी की, पुतले की पिटाई की और बीच चौराहे पर पुतला दहन किया. इसके पूर्व सांसद समर्थकों ने भाजपा नेता राजीव ओझा का पुतला
जलाया था.
यहां एक तरफ सांसद ढुल्लू महतो तो दूसरी ओर विधायक विधायक राज सिन्हा, रागिनी सिंह और अन्य नेता कार्यकर्ता हैं . नगर निगम चुनाव में पूर्व विधायक संजीव सिंह के महापौर चुने जाने के बाद गुटबाजी और बढ़ गई है. सांसद ढुल्लू महतो को संजीव सिंह से खतरा नजर आ रहा है. संजीव सिंह पर अभी से लोकसभा चुनाव लड़ने का दबाव बनाया जा रहा है, इसलिए सांसद की चिंता बढ़ गई है. चुनाव बाद सांसद और महापौर के साथ-साथ विधायक रागिनी सिंह और राज सिन्हा सहित कई नेताओं के साथ सांसद की तल्खी बढ़ गई है.
कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर एक दूसरे के खिलाफ अभियान चला रहे हैं. गाली- गलौज तक हो रही है. धनबाद में संवाद की राजनीति के बदले आपस में ही संघर्ष और देख लेने की राजनीति चल रही है. कार्यकर्ता दो गुटों में होकर एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हैं. पार्टी की किरकिरी हो रही है. अगर यही स्थिति रही तो धनबाद कोयलांचल का इलाका जो भाजपा का मजबूत गढ़ है इसे दरकते और ढहते देर नहीं लगेगी.
ढुल्लू महतो सांसद हैं, इसलिए इन पर कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना की बड़ी जिम्मेदारी है. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा है. सांसद- विधायक आपस में ही लड़ रहे हैं. जब सांसद विधायक आपस में लड़ेंगे तो स्वाभाविक है कार्यकर्ताओं पर इसका असर पड़ेगा और वह गुटों में बटे हुए नजर आएंगे.
धनबाद में टकराव, अहंकार और पैसे की राजनीति से पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा. कोई झुकने को तैयार नहीं है. एक दूसरे को देख लेने की बात चल रही है. दोनों ओर से कुछ ऐसे लोग हैं जो लड़ाने का काम कर रहे हैं. अपना मतलब साध रहे हैं.
कुछ लोगों का कहना है कि सांसद के कुछ अति उत्साही समर्थक सोशल मीडिया पर अनर्गल टिप्पणी करते हैं इससे विवाद बढ़ता है. माहौल बिगड़ता है. ऐसे लोगों को सांसद का संरक्षण प्राप्त है. सांसद महतो को संवाद की राजनीति करनी चाहिए. लेकिन वह ऐसा नहीं कर पा रहे हैं. कोई झुकने को तैयार नहीं है. विधायक और मेयर के समर्थक भी संयम नहीं दिखा रहे हैं.
धनबाद के मामले में प्रदेश नेतृत्व की चुप्पी भी सवाल खड़ा कर रहा है. यदि प्रदेश नेतृत्व हस्तक्षेप नहीं किया और संवाद की राजनीति स्थापित नहीं की तो धनबाद में अभी बहुत कुछ देखने को मिलेगा. अभी तो लोकसभा के चुनाव में तीन साल देरी है. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा टकराव की स्थिति बढ़ती चली जाएगी. अब भाजपा नेतृत्व को तय करना है कि वह क्या चाहता है. टकराव या संवाद.