सरना धर्म को अलग पहचान दिलाने की मांग तेज, राष्ट्रपति सचिवालय ने संबंधित विभाग को भेजी याचिकाBy Admin Thu, 28 May 2026 05:21 PM

रामगढ़ : सरना धर्म को जनगणना में अलग धार्मिक पहचान देने की मांग अब एक बार फिर चर्चा में आ गई है। रामगढ़ के सरकारी अधिवक्ता Sanjeev Kumar Ambashtha द्वारा राष्ट्रपति को भेजी गई याचिका पर राष्ट्रपति सचिवालय ने संज्ञान लेते हुए मामले को आवश्यक कार्रवाई और विचार के लिए संबंधित विभाग को भेज दिया है।

राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली से जारी पत्र में अवर सचिव Ashok Kumar ने जानकारी दी कि राष्ट्रपति महोदया को संबोधित यह याचिका “स्वतः स्पष्ट” है और इसे संबंधित विभाग के ध्यानार्थ अग्रेषित किया गया है। पत्र में गृह मंत्रालय से जुड़े अधिकारी Govind Mohan को भी इस विषय पर आवश्यक कार्रवाई और विचार करने के लिए भेजे जाने का उल्लेख किया गया है। साथ ही याचिकाकर्ता से आगे की जानकारी के लिए संबंधित विभाग से संपर्क बनाए रखने को कहा गया है।

अपनी याचिका में संजीव कुमार अंबष्ठ ने कहा है कि सरना धर्म आदिवासी समाज की प्राचीन और विशिष्ट धार्मिक परंपरा है, जो प्रकृति पूजा, जल-जंगल-जमीन, सरना स्थल और पारंपरिक आदिवासी संस्कृति पर आधारित है। झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में बड़ी संख्या में लोग इस धर्म को मानते हैं, लेकिन अब तक जनगणना में इसे अलग धार्मिक पहचान नहीं मिली है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में सरना अनुयायियों को अन्य धर्मों की श्रेणी में दर्ज होना पड़ता है, जिससे उनकी वास्तविक धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ पाती।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि वर्ष 2020 में Jharkhand Legislative Assembly ने सर्वसम्मति से सरना धर्म कोड लागू करने के समर्थन में प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था। राज्य सरकार और मुख्यमंत्री ने भी समय-समय पर इस मांग का समर्थन किया है। इसके अलावा कई सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों और आदिवासी समुदायों ने लंबे समय से अलग सरना कोड की मांग उठाई है।

अंबष्ठ ने अपनी याचिका में कहा कि सरना धर्म को अलग धार्मिक कोड मिलने से आदिवासी समाज की वास्तविक जनसंख्या का सही आंकड़ा सामने आएगा, उनकी संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण को मजबूती मिलेगी तथा सरकार को आदिवासी समुदायों के विकास और कल्याण के लिए बेहतर नीतियां बनाने में मदद मिलेगी।

उन्होंने राष्ट्रपति सचिवालय द्वारा मामले को आगे बढ़ाने पर आभार जताते हुए केंद्र सरकार और संसद से सकारात्मक निर्णय लेने की अपील की। उनके अनुसार यह केवल धार्मिक पहचान का मुद्दा नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की संस्कृति, अस्तित्व और सम्मान से जुड़ा प्रश्न है।