लेन-देन से जुड़ाव होने पर सोसाइटी पदाधिकारी भी चेक बाउंस मामले में अभियोजन का सामना कर सकते हैं : सुप्रीम कोर्टBy Admin Thu, 28 May 2026 07:34 PM

नई दिल्ली, 28 मई : सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी सोसाइटी के पदाधिकारियों की वित्तीय लेन-देन में सक्रिय भूमिका का प्रथमदृष्टया प्रमाण मौजूद हो, तो वे नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) के तहत चेक बाउंस मामले में अभियोजन का सामना कर सकते हैं।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने एम/एस मानसी फाइनेंस (चेन्नई) लिमिटेड द्वारा दायर अपील पर आंशिक राहत देते हुए मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया, जिसमें रविंद्र भारती एजुकेशनल सोसाइटी के चार पदाधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही समाप्त कर दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने सोसाइटी के उपाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष और प्रबंधक के खिलाफ कार्यवाही बहाल कर दी, जबकि एक कार्यकारी सदस्य के खिलाफ कार्यवाही समाप्त रखने के हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि उस सदस्य को लेन-देन से जोड़ने वाला कोई ठोस तथ्य रिकॉर्ड पर नहीं था।

मामला वर्ष 2018 का है, जब फाइनेंस कंपनी ने कथित तौर पर एजुकेशनल सोसाइटी को विकास और व्यावसायिक जरूरतों के लिए 4.5 करोड़ रुपये का ऋण दिया था। शिकायत के अनुसार, भुगतान के लिए जारी 5.12 करोड़ रुपये से अधिक का चेक नवंबर 2019 में “Account Blocked” टिप्पणी के साथ बाउंस हो गया।

मद्रास हाईकोर्ट ने यह कहते हुए पदाधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी थी कि शिकायत में केवल सामान्य आरोप लगाए गए हैं और NI Act की धारा 141 के तहत परोक्ष दायित्व तय करने के लिए आवश्यक विशिष्ट विवरण नहीं दिए गए।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल किसी संस्था में पदाधिकारी होना आपराधिक दायित्व तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है, लेकिन अदालतों को यह देखना होगा कि शिकायत और उससे जुड़े दस्तावेज आरोपियों को लेन-देन से जोड़ने का तथ्यात्मक आधार प्रस्तुत करते हैं या नहीं।

पीठ ने कहा, “किसी कंपनी या सोसाइटी का केवल पदाधिकारी होना धारा 141 के तहत दायित्व तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है। वहीं, केवल कानून की भाषा दोहराने वाली शिकायत भी टिक नहीं सकती, यदि उसमें तथ्यात्मक आधार न हो।”

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि उपाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष और प्रबंधक विभिन्न वित्तीय दस्तावेजों, जैसे प्रॉमिसरी नोट और दोनों पक्षों के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU), पर हस्ताक्षरकर्ता थे। अदालत ने कहा कि ये दस्तावेज अभियोजन जारी रखने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान करते हैं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ट्रायल के इस शुरुआती चरण में आरोपों की सत्यता या साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं किया जाएगा। यह ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर तय होगा कि संबंधित पदाधिकारी वास्तव में सोसाइटी के कार्यों के संचालन के लिए जिम्मेदार थे या नहीं।