
रांची: सोमवार का दिन राजनीतिक उठापटक और हलचल से भरा रहा. दिल्ली, रांची और पटना में बड़ी राजनीतिक घटना हुई. राजनीतिक घटनाक्रम का असर आने वाले दिनों में दिखेगा. झारखंड की राजधानी रांची में राज्यसभा चुनाव में एनडीए समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी उद्योगपति परिमल नाथवानी ने नामांकन पर्चा दाखिल कर इंडिया गठबंधन की मुश्किलें बढ़ा दी. वहीं बिहार में विधान परिषद की 10 सीटों के लिए होने वाले चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा के बेटे व मंत्री दीपक प्रकाश बेटिकट हो गए. एनडीए गठबंधन ने दीपक प्रकाश को उम्मीदवार नहीं बनाया. इसलिए वह नामांकन नहीं कर सके. अब उनका मंत्री पद से हटना तय हो गया है.
दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक हुई. बैठक के दौरान ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी में बड़ी टूट हो गई. 20 सांसदों ने अलग गुट बना लिया.
हम बात करेंगे बिहार में हुई राजनीतिक घटना की. उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोमो एनडीए का घटक दल है. इसके चार विधायक हैं. इनमें से एक उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी खुद हैं. बिहार में जब एनडीए की सरकार बनी तो उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनवा दिया. दीपक प्रकाश पहली बार पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री बनें. उस वक्त वह किसी सदन के सदस्य नहीं थे. बाद में जब सम्राट चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री बने तो इनके मंत्रिमंडल में भी दीपक प्रकाश को शामिल किया गया.
चर्चा यही थी कि बिहार विधान परिषद के लिए जब चुनाव होगा तो दीपक प्रकाश को एमएलसी बनाया जाएगा. एमएलसी बनने के बाद मंत्री पद बरकरार रहेगा. लेकिन एनडीए की ओर से दीपक प्रकाश को उम्मीदवार नहीं बनाया गया. 10 सीटों के लिए हो रहे चुनाव में भाजपा और जदयू ने चार-चार सीट आपस बांट ली और एक सीट लोजपा को मिल गई. उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को कोई सीट नहीं दी गई. चार विधायक होने की वजह से इनका दावा भी नहीं बन रहा था. एक सीट पर राजद ने राबड़ी देवी के मुंहबोले भाई सुनील सिंह को फिर से टिकट दिया है. 10 सीटों पर 10 उम्मीदवार हैं. इसलिए यहां सबका निर्विरोध चुना जाना तय है.
दीपक प्रकाश को 6 महीने के अंदर अब इस्तीफा देना पड़ेगा. जानकारी के अनुसार भाजपा उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी का भाजपा में विलय चाहती थी. लेकिन इसके लिए कुशवाहा तैयार नहीं हुए. कुशवाहा समाज से अब सम्राट चौधरी खुद मुख्यमंत्री हैं, इसलिए उपेंद्र कुशवाहा को अब बहुत तरजीह नहीं मिल रही है.
बिहार की राजनीति में अब यह सवाल गूंज रहा है कि उपेंद्र कुशवाहा क्या करेंगे. कुशवाहा के सामने दो विकल्प हैं . बेटे के इस्तीफा देने के बाद अपनी पत्नी या फिर किसी दूसरे विधायक का नाम मंत्री के लिए दे सकते हैं या फिर केंद्र में जब मंत्रिमंडल का विस्तार हो तो उपेंद्र कुशवाहा को मंत्री बनाया जाए और बिहार का कोटा उनसे ले लिया जाए.
रालोमो के तीन अन्य विधायक उपेंद्र कुशवाहा की परिवारवाद की राजनीति से नाराज हैं. भाजपा को नाराजगी की खबर है. विधायक दल बदलने को तैयार हैं. इसलिए भी उपेंद्र कुशवाहा की स्थिति एनडीए में कमजोर हो गई है. कमजोर स्थिति को देखते हुए ही उनके बेटे को एमएलसी का टिकट नहीं मिला. हालांकि कुशवाहा कह चुके हैं कि वह एनडीए के साथ है और रहेंगे. अब आगे देखना होगा कि राजनीतिक किस ओर बढ़ती है.