





एक समय में साड़ी दुनिया का बोझ उठाने वाले कुली आज खुद एक बोझ बन गए हैं। ... एक समय था जब एक स्टेशन में सैकड़ों कुली हुआ करते थे और ट्रैन के आते ही कुली कुली की पुकार से पलटफोर्म गूंज उठता था लेकिन वक्त बदला समय बदला और इस बदलते समय के साथ सफर आसान हो गया और कुलियों का बोझ कम हो गया.... आज कुलियों के चेहरे में भले ही मुस्कान हो लेकिन उनके दर्द को शायद ही कोई समझ सकता है..
वह 2008 का वक्त था जब जब लाल यादव ने रेल मंत्री रहते हुए लगभग 22000 कुलियों को गैंगमैन के तहत रेलवे में नौकरी दे दी थी लेकिन बाकी बचे लगभग 20000 कुली आज भी इंतजार कर रहे हैं कि ऐसी कोई स्कीम के तहत इन्हें भी रेलवे में ग्रेट डी की नौकरी मिल जाए
आज ये पूरे परिवार की उम्मीदें भी अपने कंधों पर ढोते हैं...घर परिवार इनके भरोसे है लेकिन ये तो सिर्फ सवारियों के भरोसे ही है
सुबह की पहली ट्रेन से लेकर रात की आखिरी ट्रेन तक...स्टेशन पर सबसे पहले अगर कोई तैयार मिलता है, तो वो है कुली बारिश हो...भीषण गर्मी हो...या कड़ाके की ठण्ड इनकी ड्यूटी कभी खत्म नहीं होती... लेकिन वक़्त ने इन्हे बेसुध और मजबूर कर दिया है
ट्रैन आती है... सवारी भी आते हैं... लेकिन अब कोई कुली नहीं लेता है... किसी के पास एक सूटकेस किसी के पास दो बैग... डिजिटल दौर में जब लोग ट्रॉली बैग लेकर चलने लगे...और कुली मायूस हो गए
हम इस वक़्त रांची रेलवे स्टेशन में सिर्फ 28 कुली हैं और उन्हें 30 *10 के कमरे में आश्रय दिया गया है और इसे कुली आश्रय घर का नाम दिया गया है... यही जमीन पर सोना है...
देशभर में कुलियों की स्थिति यही है किसी न किसी तरह रोजगार के नाम पर वह सामान तो धो रहे हैं लेकिन आमदनी के नाम पर नाम मात्र.... रेलवे मंत्रालय न जाने उनकी सुध कब लेगा... क्या सैकड़ो सालों से अपनी सेवा दे रहे कुलियों को कभी अपनी मंजिल मिलेगी




