
आषाढ़ मास की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति और सनातन आध्यात्मिक परंपरा का एक अत्यंत पावन पर्व है। यह दिन उस गुरु-तत्त्व के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है, जो साधक के जीवन में अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान, विवेक और आत्मबोध का प्रकाश फैलाता है। सद्गुरु केवल शिक्षा देने वाले व्यक्ति नहीं, बल्कि वे दिव्य मार्गदर्शक होते हैं जो मनुष्य को सांसारिक बंधनों से ऊपर उठाकर ईश्वर की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देते हैं।
जगद्गुरु परमहंस योगानन्दजी ने गुरु के महत्व को अत्यंत सरल और गहन शब्दों में व्यक्त किया है—“गुरु ईश्वर की ओर से भेजा हुआ वह देवदूत होता है जो आपको मुक्ति प्रदान करता है। जब आपका ज्ञान गुरु के ज्ञान के साथ एकाकार हो जाता है, तब आपको मुक्ति मिलती है; अन्यथा आप अपनी इच्छाओं के दास बने रहते हैं।” उनके ये शब्द आज भी प्रत्येक साधक के लिए प्रेरणा और आशा का स्रोत हैं।
परमहंस योगानन्दजी ने अपनी विश्वविख्यात आत्मकथा योगी कथामृत में क्रियायोग को “ईश्वर के पास पहुँचने के लिए विमान मार्ग” की संज्ञा दी है। उनके अनुसार यह एक वैज्ञानिक आध्यात्मिक साधना है, जो मनुष्य को आत्मिक शांति, आंतरिक आनंद और ईश्वर के प्रत्यक्ष अनुभव की ओर ले जाती है। इसी दिव्य ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए उन्होंने 1917 में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया (YSS) तथा 1920 में अमेरिका में सेल्फ-रियलाइज़ेशन फेलोशिप (SRF) की स्थापना की। आज भी लाखों साधक गृह अध्ययन पाठमालाओं के माध्यम से उनके द्वारा प्रदत्त क्रियायोग की शिक्षाओं का लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
मानव जीवन में इच्छाएँ, आसक्तियाँ और द्वंद्व निरंतर मन को विचलित करते रहते हैं। इनसे ऊपर उठकर आत्मिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए सद्गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य माना गया है। संत कबीरदास ने गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है—
"यह तन विष की बेल री, गुरु अमृत की खान।
शीश दिये यदि गुरु मिलें, तो भी सस्ता जान॥"
गुरु न केवल साधना का मार्ग दिखाते हैं, बल्कि अपने शिष्य के आध्यात्मिक कल्याण के लिए निरंतर कार्यरत रहते हैं। उनके प्रति श्रद्धा, विश्वास और नियमित साधना ही शिष्य को ईश्वर के निकट ले जाती है। गुरु का वास्तविक सान्निध्य उनके भौतिक शरीर तक सीमित नहीं होता, बल्कि उनकी चेतना, शिक्षाओं और कृपा के माध्यम से सदैव उपलब्ध रहता है। परमहंस योगानन्दजी की परम शिष्या श्री श्री दया माताजी ने कहा था—“गुरुजी उतने ही तुम्हारे नज़दीक हैं, जितने तुम्हारे विचार उन्हें तुम्हारे निकट आने की अनुमति देते हैं।”
गुरु पूर्णिमा हमें केवल गुरु का सम्मान करने की प्रेरणा नहीं देती, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में उतारने का भी संदेश देती है। यह पर्व आत्मचिंतन, साधना और ईश्वर के प्रति समर्पण का अवसर है। आइए, इस पावन अवसर पर हम अपने जीवन में सद्गुरु की शिक्षाओं को अपनाने का संकल्प लें और परमहंस योगानन्दजी के इन प्रेरणादायी शब्दों को अपनी प्रार्थना बनाएँ—“हे गुरु, आप मूक ईश्वर की मुखर वाणी हैं; मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आप मोक्ष के मंदिर के दिव्य द्वार हैं; मैं आपको प्रणाम करता हूँ।”
लेखिका – श्रीमती (डॉ) मंजु लता