

BY GYAN RANJAN
RANCHI : पद्मभूषण दिशोम गुरु शिबू सोरेन का मंगलवार को पहली पुण्यतिथि है। 4 अगस्त 2025 को जीवन में कभी किसी से नहीं हारनेवाले झारखंड के योद्धा दिशोम गुरु शिबू सोरेन मौत से लंबी लड़ाई लड़ते-लड़ते हार गए थे। जल, जंगल जमीन और आदिवासी अस्मिता के महान रक्षक दिशोम गुरु शिबू सोरेन की जीवन गाथा को शब्दों में पिरोना सूरज को दीपक दिखाने जैसा है। रामगढ़ जिले के नेमरा गाँव में एक गरीब परिवार में जन्मे गुरुजी की कहानी एक ऐसे संघर्ष की कहानी है जो वर्तमान ही नहीं आनेवाले कई दशकों की पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक का काम करेगी। केंद्र सरकार द्वारा झारखंड आंदोलन के महानायक और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। उनकी पत्नी रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों पुरस्कार लिया। वो दिन राज्य के लिए गौरवपूर्ण क्षण रहा। इस सर्वोच्च सम्मान के साथ ही उनके जीवन संघर्ष का वह अनछुआ अध्याय भी एक बार फिर चर्चा में आ गया है, जिससे आज की पीढ़ी पूरी तरह वाकिफ नहीं है।
दिशोम गुरु के करीबी सहयोगी रहे जमशेदपुर के पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो ने अपनी पुस्तक 'झारखंड की समरगाथा' में शिबू सोरेन के जीवन के इस निर्णायक मोड़ का विस्तार से उल्लेख किया है।
पुस्तक के अनुसार, एक पुराने साक्षात्कार में शिबू सोरेन ने भावुक होते हुए बताया था कि उनके पिता सोबरन माझी कांग्रेस के एक बेहद सक्रिय कार्यकर्ता और पक्के गांधीवादी थे। लेकिन जब सूदखोरों और शोषकों ने उनकी निर्मम हत्या कर दी, तो सांत्वना देना तो दूर, एक भी कांग्रेसी नेता उनकी लाश तक देखने नहीं पहुंचा। अपनों की यह उपेक्षा और व्यवस्था की निष्ठुरता युवा शिबू सोरेन के दिल में चुभ गई। यही घटना उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बनी और उन्होंने महाजनी प्रथा, शोषण तथा अन्याय के खिलाफ हथियार उठाने के बजाय जनआंदोलन का रास्ता चुना।
महज 16 वर्ष की उम्र में सिर से उठा पिता का साया
11 जनवरी 1944 को गोला प्रखंड के नेमरा गांव में जन्मे शिवचरण माझी (बचपन का नाम) ने महज 16 वर्ष की अल्पायु में अपने पिता को खो दिया था। उनके पिता सोबरन माझी न केवल एक स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि वे एक शिक्षक और सामाजिक चेतना के वाहक भी थे। पिता की हत्या ने युवा शिवचरण के भीतर व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह की आग सुलगती छोड़ दी, जो आगे चलकर शिबू सोरेन और फिर आदिवासियों के दिशोम गुरु के रूप में प्रकट हुई।
आपातकाल के दंश में भी नहीं थमा आंदोलन
राजनीतिक संघर्ष के दिनों में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उन्हें रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लागू किए गए आपातकाल (इमरजेंसी) के दौरान प्रशासन ने उन्हें बंदी बनाने के लिए चौतरफा अभियान चलाया। लेकिन शिबू सोरेन डिगे नहीं, वे टुंडी और पीरटांड़के सुदूर जंगलों व गांवों में छिपकर आंदोलन की कमान संभालते रहे। उस दौर में पोखरिया आश्रम उनके आंदोलन का मुख्य केंद्र बना और यहीं पर उनके अदम्य साहस को देखते हुए स्थानीय जनता ने उन्हें दिशोम गुरु (देश के गुरु) की उपाधि से नवाजा।
बोकारो और रामगढ़ जिले से सटे नेमरा गांव में संताल परिवार में जन्मे शिबू सोरेन झारखंड राज्य की पहचान हैं। सूदखोरों जिन्हें स्थानीय तौर पर महाजन कहते थे के जाल में फंसकर आदिवासी परिवारों की बर्बादी और दुर्दशा देखकर युवा शिबू सोरेन ने आंदोलन प्रारंभ किया। नेमरा से निकला यह आंदोलन बाद में अलग झारखंड राज्य निर्माण के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया।
चार अगस्त को नेमरा में जुटेगा झारखंड, बाबा शिबू सोरेन को दी जायेगी श्रद्धांजलि
दिशोम गुरु शिबू सोरेन की प्रथम पुण्यतिथि चार अगस्त को उनके पैतृक गांव रामगढ़ जिले के नेमरा में मनायी जायेगी. बाबा शिबू सोरेन की यादों को नेमरा गांव के लोग भूल नहीं पा रहे हैं. श्रद्धांजलि देने के लिए हर समाज व वर्ग के लोग नेमरा गांव पहुंचेंगे. सोना सोबरन प्लस टू उच्च विद्यालय, लुकैयाटांड़ परिसर में शिबू सोरेन की प्रतिमा लगायी गयी है. इसका अनावरण मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन करेंगे.
पैतृक आवास के आंगन में बाबा शिबू सोरेन का श्रद्धांजलि कार्यक्रम होगा. यहां शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन, पुत्र हेमंत सोरेन, बसंत सोरेन, कल्पना सोरेन समेत परिवार के सभी सदस्य पारंपरिक सामाजिक रीति रिवाज से बाबा को याद करेंगे. शिबू सोरेन के समाधि स्थल नाड़ी दरहा नेमरा तक सड़क का निर्माण कराया गया है.बाबा के दाह संस्कार स्थल जाकर संताली रीति रिवाज से हुए श्राद्धकर्म को याद करेंगे. श्रद्धांजलि कार्यक्रम के बाद लुकैयाटांड़ मैदान में मुख्यमंत्री का संबोधन के साथ विकास मेला सह परिसंपत्ति वितरण कार्यक्रम होगा. इसके लिए 400 फीट का पंडाल और स्टेज बनाया गया है.
