“शतायु संघ और महिला सहभागिता” केवल एक पुस्तक का विषय नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र निर्माण में महिलाओं के योगदान को समझने का अवसर प्रदान करता है : राज्यपाल By Admin Mon, 17 August 2026 07:30 PM

RANCHI : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी यात्रा के अवसर पर विश्व संवाद केंद्र, राँची के तत्वावधान में “शतायु संघ और महिला सहभागिता” पुस्तक पर विशेष परिचर्चा कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में राष्ट्र निर्माण, महिला सहभागिता, भारतीय परिवार व्यवस्था, सामाजिक संस्कार तथा महिलाओं की बदलती भूमिका जैसे विषयों पर व्यापक विमर्श हुआ। कार्यक्रम में झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी, राष्ट्र सेविका समिति की अखिल भारतीय सह कार्यवाहिका सुश्री सुनीता इंदुलकर, झारखंड प्रांत प्रचारक गोपाल शर्मा , उत्तर पूर्व क्षेत्र के संपर्क प्रमुख अनिल ठाकुर, प्रांत सह संघचालक अशोक श्रीवास्तव तथा पुस्तक की लेखिका डॉ. शोभा विजेंद्र, डॉ राजीव कमल बिट्टू-प्रान्त संपर्क प्रमुख , संघ के क्षेत्र,प्रांत, विभाग एवं महानगर के अधिकारी ,अन्य संगठन के अधिकारी सहित अनेक शिक्षाविद्, अपने क्षेत्र में लब्ध प्रतिष्ठित मातृ शक्ति,सामाजिक कार्यकर्ता, प्रबुद्धजन एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। राज्यपाल संतोष गंगवार ने कहा कि “शतायु संघ और महिला सहभागिता” केवल एक पुस्तक का विषय नहीं है, बल्कि यह समाज को संघ की भूमिका तथा राष्ट्र निर्माण में महिलाओं के योगदान को समझने का अवसर प्रदान करता है।

उन्होंने कहा कि पुस्तकें केवल शब्दों का संकलन नहीं होतीं। वे किसी कालखंड के अनुभव, विचार और संवेदनाओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का माध्यम होती हैं। ऐसे समय में जब डिजिटल माध्यमों के कारण पढ़ने की आदत प्रभावित हो रही है, पुस्तकों का महत्व और बढ़ जाता है।

राज्यपाल ने कहा कि राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका को केवल परिवार तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। भारतीय समाज में महिला परिवार की आधारशिला होने के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। आज महिलाएँ विज्ञान, शिक्षा, प्रशासन, उद्योग, खेल, सामाजिक सेवा और सार्वजनिक जीवन सहित लगभग हर क्षेत्र में अपनी क्षमता सिद्ध कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि महिलाओं की सहभागिता केवल संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में उनकी प्रभावी भूमिका भी सुनिश्चित होनी चाहिए। लोकतांत्रिक संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने महिला आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता पर भी बल दिया।

श्री गंगवार ने कहा कि पंचायत और स्थानीय निकायों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने यह सिद्ध किया है कि महिलाएँ प्रशासनिक जिम्मेदारियों को कुशलता और संवेदनशीलता के साथ निभा सकती हैं। महिलाओं की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी बढ़ने से विकास में संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण जुड़ता है।
 

उन्होंने कहा कि “विकसित भारत 2047” की यात्रा में नारी शक्ति की सक्रिय सहभागिता अनिवार्य है। एक शिक्षित महिला केवल अपने जीवन को दिशा नहीं देती, बल्कि परिवार और आने वाली पीढ़ी को भी प्रभावित करती है। एक आत्मनिर्भर महिला परिवार और समाज में आत्मविश्वास तथा परिवर्तन की चेतना उत्पन्न करती है।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि एवं नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कहा कि भारतीय समाज और हिंदुत्व को केवल उपासना पद्धति के आधार पर समझना उचित नहीं है। भारतीय दृष्टिकोण इससे कहीं व्यापक है। भारत ने “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना के साथ संपूर्ण मानवता को परिवार के रूप में स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व का अर्थ किसी एक पूजा पद्धति या मत को मानना नहीं, बल्कि जीवन को व्यापक दृष्टि से देखने वाली भारतीय विचार परंपरा है। विविधता भारत की शक्ति है और इसी विविधता को स्वीकार करते हुए समाज को साथ लेकर चलना भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है। श्री मरांडी ने कहा कि संघ की शताब्दी के अवसर पर समाज के सामने भारतीय विचार और जीवन दृष्टि को स्पष्ट रूप से रखने की आवश्यकता है। उन्होंने “शतायु संघ और महिला सहभागिता” पुस्तक को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि वे स्वयं पुस्तक का अध्ययन करेंगे और समाज के लोगों से भी इसके अध्ययन का आग्रह करेंगे।


पुस्तक की लेखिका डॉ. शोभा विजेंद्र ने कहा कि वर्तमान समय में सोशल मीडिया और विभिन्न माध्यमों से अनेक प्रकार के नैरेटिव तेजी से समाज में स्थापित किए जा रहे हैं। कई बार बिना तथ्य और प्रमाण के किसी धारणा को बार-बार प्रस्तुत करके उसे सत्य के रूप में स्वीकार कराने का प्रयास होता है। ऐसे समय में आवश्यक है कि समाज भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय तथ्य, अध्ययन और तर्क के आधार पर विमर्श करे। उन्होंने कहा कि संघ और महिलाओं की भूमिका को लेकर लंबे समय से यह धारणा प्रचारित की जाती रही है कि संघ महिलाओं को केवल परिवार अथवा चौके-चूल्हे तक सीमित रखना चाहता है। “शतायु संघ और महिला सहभागिता” इसी प्रकार के नैरेटिव का तथ्यात्मक और शोधपरक अध्ययन प्रस्तुत करती है।