
झारखंड के डीजीपी की नियुक्ति को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट में अहम मोड़ पर पहुंच गया है। सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले डीजीपी की नियुक्ति और इसके बाद दो साल का कार्यकाल दिए जाने पर सवाल उठाए गए हैं। मामले में न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) और वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट दाखिल कर दी है। अब इसी रिपोर्ट के आधार पर मामले में आगे की सुनवाई होगी।
दरअसल, विवाद वर्तमान डीजीपी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति और डीजीपी चयन को लेकर राज्य सरकार की ओर से बनाए गए नियमों से जुड़ा है। एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि सेवानिवृत्ति से महज एक दिन पहले किसी अधिकारी को डीजीपी नियुक्त कर दो साल का कार्यकाल देना सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्देशों और यूपीएससी की प्रक्रिया के अनुरूप है या नहीं।
इस मामले की शुरुआत झारखंड सरकार के 8 जनवरी 2025 को जारी नए डीजीपी नियुक्ति नियमों से हुई थी। इन नियमों को चुनौती देते हुए झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई थी। आरोप था कि नए नियम सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह मामले में दिए गए डीजीपी नियुक्ति संबंधी दिशा-निर्देशों को प्रभावित करते हैं।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 18 अगस्त 2025 को मामले में आदेश दिया। राज्य सरकार ने बाद में नियम 5(सी) में संशोधन किया और इसके तुरंत बाद 30 दिसंबर 2025 को नई डीजीपी नियुक्ति की गई। इस नियुक्ति को भी अदालत में चुनौती दी गई है।
रिपोर्ट में नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि राज्य सरकार ने यूपीएससी को नाम भेजे बिना संशोधित नियमों के आधार पर नियुक्ति की। वहीं, डीजीपी के नाम पर विचार करते समय ऐसे अधिकारियों को शामिल करने की बात कही गई है, जिनकी सेवानिवृत्ति में कम से कम छह महीने का समय बचा हो।
मामले की अगली सुनवाई अब 7 सितंबर को होगी। ऐसे में सभी की नजर इस बात पर है कि सुप्रीम कोर्ट डीजीपी नियुक्ति की प्रक्रिया और राज्य सरकार के नियमों को लेकर क्या रुख अपनाता है।