
झारखंड की राजनीति में एक ऐसा संयोग सामने आया है, जो बेहद दुखद और झकझोर देने वाला है। पिछले करीब साढ़े तीन वर्षों के दौरान राज्य ने शिक्षा विभाग से जुड़े तीन मंत्रियों को खो दिया। इस कड़ी में अब मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का नाम भी जुड़ गया है।
सुदिव्य कुमार सोनू का 6 सितंबर 2026 को आकस्मिक निधन हो गया। गिरिडीह में आज उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। वह झारखंड सरकार में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा समेत कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनके निधन के बाद राजनीतिक जगत से लेकर शिक्षा और प्रशासनिक क्षेत्रों तक शोक का माहौल है।
इस पूरे घटनाक्रम को इसलिए भी असाधारण माना जा रहा है, क्योंकि इससे पहले शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी संभाल चुके जगरनाथ महतो और रामदास सोरेन का भी मंत्री पद पर रहते हुए निधन हो चुका है।
2023 में हुई थी जगरनाथ महतो की विदाई
इस दुखद सिलसिले की शुरुआत 6 अप्रैल 2023 को हुई थी। उस समय स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे जगरनाथ महतो का निधन हो गया था।
जगरनाथ महतो झारखंड की राजनीति में अपने आक्रामक तेवर और बेबाक अंदाज के लिए पहचाने जाते थे। उनके समर्थक उन्हें ‘टाइगर जगरनाथ’ के नाम से भी संबोधित करते थे।
कोरोना संक्रमण के बाद उनकी सेहत लगातार चुनौतीपूर्ण बनी रही। नवंबर 2020 में उनका फेफड़ा प्रत्यारोपण भी हुआ था। बाद में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के चलते उन्हें चेन्नई ले जाया गया, जहां 6 अप्रैल 2023 को उनका निधन हो गया।
उनके निधन के बाद झारखंड सरकार ने दो दिन के राजकीय शोक की घोषणा की थी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन समेत तमाम नेताओं ने उनके निधन को राज्य के लिए बड़ी क्षति बताया था।
करीब दो साल बाद रामदास सोरेन का निधन
जगरनाथ महतो के निधन के लगभग दो वर्ष बाद झारखंड को एक और बड़ा झटका लगा।
तत्कालीन स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता मंत्री रामदास सोरेन 2 अगस्त 2025 को अपने आवास के बाथरूम में गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए थे। हालत गंभीर होने पर उन्हें बेहतर इलाज के लिए दिल्ली एयरलिफ्ट किया गया।
दिल्ली के अपोलो अस्पताल में उनका उपचार चल रहा था, लेकिन 15 अगस्त 2025 को उनका निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र 62 वर्ष थी।
रामदास सोरेन ने ग्राम प्रधान के तौर पर सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की थी। लंबे राजनीतिक संघर्ष के बाद वह राज्य सरकार में मंत्री बने। उनके निधन की खबर के बाद झारखंड में शोक की लहर फैल गई थी।
अब सुदिव्य कुमार सोनू की असमय विदाई
अब इस दर्दनाक कड़ी में तीसरा नाम सुदिव्य कुमार सोनू का जुड़ गया है।
गिरिडीह सदर के विधायक और झारखंड सरकार में मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का 6 सितंबर 2026 को अचानक निधन हो गया। उपलब्ध शुरुआती जानकारी के अनुसार, तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें गिरिडीह के मर्सी अस्पताल ले जाया गया था, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। प्रारंभिक जानकारी में कार्डियक अरेस्ट को मौत की वजह बताया गया है।
सुदिव्य कुमार सोनू के पास उच्च एवं तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ नगर विकास एवं आवास, पर्यटन, कला-संस्कृति और खेलकूद एवं युवा कार्य जैसे महत्वपूर्ण विभाग भी थे।
यानी उनके निधन का असर सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है। शिक्षा, शहरी विकास, पर्यटन और युवा मामलों से जुड़े विभागों के लिए भी यह एक बड़ा झटका है।
तीन अलग नेता, लेकिन एक दर्दनाक संयोग
जगरनाथ महतो, रामदास सोरेन और सुदिव्य कुमार सोनू की राजनीतिक यात्राएं एक-दूसरे से अलग थीं। तीनों की अपनी अलग राजनीतिक पहचान और कार्यशैली थी।
लेकिन इन तीनों को अब एक ऐसे संयोग ने जोड़ दिया है, जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की होगी।
तीनों ने शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली और मंत्री पद पर रहते हुए असमय दुनिया को अलविदा कह दिया।
शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है। सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारना, शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना, उच्च शिक्षा को मजबूत करना, तकनीकी शिक्षा का विस्तार और युवाओं के लिए रोजगार एवं अवसर तैयार करना सरकार के सामने लगातार बड़ी जिम्मेदारियां रही हैं।
इन नेताओं के निधन के साथ कई योजनाएं, राजनीतिक लक्ष्य और व्यक्तिगत जिम्मेदारियां भी अधूरी रह गईं।
झारखंड की सियासत में एक दर्दनाक अध्याय
6 अप्रैल 2023 को जगरनाथ महतो के निधन से शुरू हुई यह पीड़ादायक कड़ी 15 अगस्त 2025 को रामदास सोरेन के निधन के साथ और गहरी हुई। अब 6 सितंबर 2026 को सुदिव्य कुमार सोनू के आकस्मिक निधन ने इस संयोग को और मार्मिक बना दिया है।
तीनों नेताओं की पहचान अलग थी। जगरनाथ महतो अपने जुझारू तेवर के लिए जाने गए, रामदास सोरेन ने लंबे जनसंघर्ष के बाद राजनीति में अपनी जगह बनाई और सुदिव्य कुमार सोनू सक्रिय राजनीतिक शैली के लिए पहचाने जाते थे।
लेकिन अब तीनों झारखंड की राजनीतिक स्मृतियों का हिस्सा हैं।
साढ़े तीन साल के भीतर शिक्षा विभाग से जुड़े तीन मंत्रियों की असमय मौत का यह सिलसिला झारखंड की राजनीति के इतिहास में एक बेहद दर्दनाक अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है।