
RANCHI : रविवार यानि 6 सितंबर की सुबह झारखंड की राजनीति के एक चमकीले सितारे का अस्त हो गया। एक ऐसा सितारा जिसने अपने नाम के अनुरूप ही काम किया, चाहे एक कार्यकर्ता के रूप में पार्टी के विस्तार को लेकर हो, विधायक के रूप में विधानसभा के भीतर हो या फिर सरकार के मंत्री के रूप में हो। सुदिव्य जिसका शाब्दिक अर्थ होता है दिव्यमान या चमकीला। उनकी चमक ही थी कि उनके निधन की खबर सुनकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की हिम्मत भी पस्त दिखी। कैबिनेट मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के जाने के दिन जिस तरह मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन हेमंत उन्हें अपलक निहार रहे थे, उसने बता दिया कि सीएम के समक्ष अब दूर-दूर तक शून्यता फैली हुई है। अब न मंच पर सोनू की प्रखर आवाज गूंजेगी, न वे विधानसभा में सरकार का रक्षा कवच बनेंगे और न ही पार्टी की रणनीति बनाने में ही कोई सहयोग कर पाएंगे। वे विदा ले चुके हैं। मुख्यमंत्री के लिए इस रिक्तता को भरना आसाान नहीं होगा। सीएम को अपने इस फ्रंटलाइन रणनीतिकार की कमी को पूरा करने के लिए कड़ा संघर्ष करना होगा।
गुरुजी के राजनीतिक काल में ही अपना एक मजबूत स्थान बना चुके सुदिव्य सदैव हेमंत सोरेन के साथ रहे। पार्टी हो या सरकार जब भी कोई राजनीतिक या कानूनी संकट आता था सोनू ही उसका सफल काट ढूँढने में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का सहयोग करते थे। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हाल के दिनों में सोनू ही झामुमो के एकमात्र 'थिंक-टैंक' थे।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद एक समय ऐसा आया था कि झारखंड में झामुमो के बिखराव का समय आ गया हो। जेल जाने से पहले हेमंत सोरेन ने भले ही गुरुजी के सबसे करीबी रहे चंपाई सोरेन को राज्य की बागडोर सौंप दी, लेकिन उस विकट घड़ी में पार्टी के कवच बने थे सुदिव्य कुमार सोनू। वर्ष 2024 में गांडेय विधानसभा उपचुनाव में घर की दहलीज से पहली बार बाहर निकलकर कल्पना सोरेन ने राजनीति में प्रवेश किया। उस समय मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जेल में थे। कल्पना सोरेन के चुनावी अभियान का पूरा बीड़ा अपने कंधे पर लिया सुदिव्य कुमार सोनू ने और ऐतिहासिक जीत दर्ज कराई। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी सुदिव्य की रणनीति ने भाजपा को बड़ा झटका दिया था। इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में भी हेमंत सोरेन के सबसे बड़े सिपहसालार बने थे सोनू।
सोनू सिर्फ एक विधायक या मंत्री तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के उन बेहद करीबी और गिने-चुने रणनीतिकारों में थे, जो पार्टी की कानूनी, राजनीतिक और मीडिया से जुड़ी हर बारीक रणनीति को अंतिम रूप देते थे। झामुमो की मूल पहचान हमेशा से आदिवासी राजनीति की धुरी के इर्द-गिर्द रही है। पर, गैर आदिवासी सोनू ने हजारीबाग, गिरिडीह, धनबाद जैसे क्षेत्रों में गैर-आदिवासी और शहरी/मध्यम वर्ग के बीच झामुमो को एक स्वीकार्य स्थिति में लाया। पार्टी जितनी मजबूत हुई, सोनू का जनाधार भी उसी अनुपात में बढ़ा। सुदिव्य कहते थे, हमारा आक्रामण ही हमारा बेस्ट डिफेंस है। फ्लोर मैनेजमेंट में उनके इस आक्रामक डिफेंस को सदन ने कई बार देखा। विधानसभा के पटल पर जब भी विपक्ष की ओर से सरकार को घेरने के तीखे हमले होते थे, तो सोनू सबसे तार्किक, शालीन, लेकिन उतने ही आक्रामक अंदाज में सरकार का बचाव करते थे। ऐसे में झामुमो ने अपना सबसे मुखर और दक्ष फ्लोर मैनेजर खो दिया है। सोनू का जाना केवल एक मंत्री पद का खाली होना नहीं है, बल्कि उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल में जेएमएम के सबसे प्रमुख गैर आदिवासी/ओबीसी चेहरे और वैचारिक थिंक-टैंक की विदाई है। इस क्षेत्र में उनके जैसी राजनीतिक पकड़ और वैचारिक स्पष्टता वाले नेता की कमी लंबे समय तक खटकेगी।
कांग्रेस और राजद जैसे घटक दलों के साथ गठबंधन के पेंच सुलझाने हों या फिर पार्टी के भीतर किसी नाराज विधायक को साधना हो, सोनू हमेशा मुख्यमंत्री के अनौपचारिक दूत की भूमिका निभाते हुए टेबल टॉक से हर समस्या का समाधान निकाल लेते थे। उच्च शिक्षा जैसे अहम विभागों में उनकी कार्यशैली 'सीधी बात, साफ निर्देश' वाली रही। वे केवल बाबूओं की नोटिंग पर आंख मूंदकर दस्तखत करने वाले मंत्री नहीं थे, बल्कि खुद नीतिगत ड्राफ्ट को गहराई से पढ़कर उसमें सुधार करने का माद्दा रखते थे। जब भी सरकार पर नौकरशाही के हावी होने के आरोप लगे, सुदिव्य सोनू ने हमेशा जनता और सिस्टम के बीच एक प्रभावी संतुलन बनाने वाले सुलझे हुए राजनेता के रूप में अपनी भूमिका निभाई। गिरिडीह में छह महीने के अंदर उपचुनाव होगा। ऐसे में सोनू के निधन के बाद राजनीतिक गलियारों में इस चर्चा को बल मिलेगा कि गिरिडीह सीट पर होने वाले संभावित उपचुनाव में झामुमो किसे उतारेगा और कैसे अपनी इस सीट को बचााएगा। हालांकि इसका हल खोजना बहुत मुश्किल नहीं होगा, क्योंकि पूर्व के उपचुनावों को देखें तो यह साफ है कि दिवंगत मंत्रियों के परिजनों में से ही किसी एक को टिकट मिलता रहा है। पर, कैबिनेट में खाली हुई जगह को किस क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरण के तहत भरा जाएगा, यह देखना वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में हेमंत सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।