दृष्टिहीनता को दी चुनौती, लद्दाख की 20,000 फीट ऊंची जो-जोंगो चोटी पर फहराया तिरंगाBy Mid Time Bureau Mon, 07 September 2026 02:22 PM

पश्चिमी सिंहभूम के दो दृष्टिबाधित युवाओं ने यह साबित कर दिया है कि किसी मंजिल तक पहुंचने के लिए आंखों से ज्यादा जरूरी मजबूत हौसला और दृढ़ इच्छाशक्ति होती है। टोडानाहातु गांव के 24 वर्षीय शेखर गोप और कादाजामदा के 23 वर्षीय धीरोज कुम्हार ने लद्दाख की करीब 20 हजार फीट ऊंची जो-जोंगो चोटी पर पर्वतारोहण अभियान में हिस्सा लेकर साहस और आत्मविश्वास की मिसाल कायम की है। जन्म से दृष्टिबाधित शेखर और धीरोज के सामने बचपन से ही कई चुनौतियां थीं। एक समय ऐसा भी था जब उनके पास सामान्य आवागमन के लिए जरूरी सफेद छड़ी तक उपलब्ध नहीं थी। लेकिन वर्ष 2022 में टाटा स्टील फाउंडेशन की ‘सबल’ पहल से जुड़ने के बाद उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया। दोनों ने ब्रेल और मोबिलिटी प्रशिक्षण हासिल किया और आगे चलकर दूसरे दृष्टिबाधित लोगों को भी प्रशिक्षण देने लगे।

खेल के मैदान में भी दोनों ने अपनी अलग पहचान बनाई। शेखर झारखंड ब्लाइंड फुटबॉल टीम की कप्तानी कर चुके हैं, जबकि धीरोज राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुके हैं। पर्वतारोहण अभियान के लिए दोनों ने जमशेदपुर की दलमा पहाड़ियों में लंबे समय तक कठिन अभ्यास किया और खुद को ऊंचाई वाले इलाकों की चुनौतियों के लिए तैयार किया। लद्दाख पहुंचने के बाद मौसम और कम ऑक्सीजन ने अभियान को और मुश्किल बना दिया। धीरोज की तबीयत बिगड़ने के कारण उन्हें करीब 16,732 फीट की ऊंचाई पर स्थित बेस कैंप में ही रुकना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अपना हौसला बनाए रखा और शेखर के अभियान को लगातार समर्थन दिया।

दूसरी ओर, शेखर ने मुश्किल परिस्थितियों के बीच आगे बढ़ना जारी रखा। तमाम चुनौतियों को पार करते हुए उन्होंने जो-जोंगो की मुख्य चोटी तक पहुंचकर वहां तिरंगा फहराया। यह उपलब्धि उनके लिए केवल एक पर्वतारोहण अभियान की सफलता नहीं थी, बल्कि उन तमाम सामाजिक धारणाओं को चुनौती देने का प्रतीक भी बनी, जो अक्सर दृष्टिबाधित लोगों की क्षमताओं को सीमित मान लेती हैं। शेखर के लिए यह चढ़ाई उनके जीवन की चुनौतियों से जुड़ी एक भावनात्मक यात्रा रही। उन्होंने माना कि चोटी तक पहुंचना उनके लिए अपने डर और लोगों की बनाई सीमाओं को पीछे छोड़ने जैसा अनुभव था। धीरोज भी अभियान पूरा न कर पाने के बावजूद निराश नहीं हैं। स्वास्थ्य कारणों से बेस कैंप पर रुकने के बावजूद उनका कहना है कि उनका हौसला शेखर के साथ हर कदम पर आगे बढ़ता रहा। गांव की साधारण पगडंडियों से शुरू हुआ इन दोनों युवाओं का सफर अब बर्फीली पहाड़ियों और ऊंची चोटियों तक पहुंच चुका है। उनकी कहानी बताती है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, मजबूत इरादे इंसान को अपनी सीमाओं से आगे निकलने की ताकत दे सकते हैं।