नीलाम्बर-पीताम्बर विश्वविद्यालय(NPU) में बिना टेंडर 37 लाख की डिग्री छपाई का मामला, VC पर नियमों की अनदेखी के आरोपBy Mid Time Bureau Tue, 15 September 2026 10:56 AM

Ranchi: नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय (NPU), पलामू में छात्रों की डिग्रियां छपवाने के लिए कथित तौर पर बिना टेंडर प्रक्रिया अपनाए उत्तर प्रदेश की एक प्रिंटिंग कंपनी को काम देने का मामला सामने आया है। आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने करीब 37 लाख रुपये की लागत से डिग्रियां छपवायीं। इसके अलावा प्रिंटर ने किराये के मद में करीब 1.20 लाख रुपये का अतिरिक्त चार्ज भी लिया है।

मामले में कुलपति दिनेश सिंह पर विश्वविद्यालय की निर्धारित खरीद और टेंडर प्रक्रिया की अनदेखी करने के आरोप लगाए जा रहे हैं। आरोप है कि कुलपति ने परीक्षा नियंत्रक और उनके ओएसडी के माध्यम से उत्तर प्रदेश के प्रिंटर को नामांकन (नॉमिनेशन) के आधार पर काम दिलाया।

परीक्षा नियंत्रक के बजाय OSD को भेजा गया ऑफर लेटर

जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश की प्रिंटिंग कंपनी ने परीक्षा नियंत्रक अजीत सेठ के नाम ऑफर लेटर भेजा था। इसकी एक प्रति कुलपति को भी दी गयी थी। बताया जा रहा है कि परीक्षा नियंत्रक ने इस ऑफर लेटर को कुलपति से अनुमोदित नहीं कराया। इसके बाद कुलपति की ओर से वही ऑफर लेटर परीक्षा नियंत्रक के ओएसडी गौरव कुमार को अनुमोदन के लिए भेजा गया।

आरोप है कि ओएसडी को भेजे गये ऑफर लेटर के आधार पर फाइल तैयार की गयी और बिना खुली निविदा प्रक्रिया के नॉमिनेशन के आधार पर संबंधित प्रिंटर को डिग्री छपाई का काम सौंप दिया गया।

सादे कागज पर हुआ एकरारनामा

मामले में एक और गंभीर सवाल एकरारनामे को लेकर उठ रहा है। आरोप है कि प्रिंटर को काम सौंपने के बाद विश्वविद्यालय ने उसके साथ सादे कागज पर एकरारनामा किया। विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड और निर्धारित सरकारी प्रक्रिया के तहत किसी कार्य के लिए अनुबंध करने की प्रक्रिया तय होती है। ऐसे में सादे कागज पर हुए इस एकरारनामे की वैधता को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

बताया जा रहा है कि इसी एकरारनामे के आधार पर प्रिंटर ने करीब 37 लाख रुपये की डिग्रियां छापकर विश्वविद्यालय को उपलब्ध करायीं। अब विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।

दीक्षांत समारोह के बाद लिया गया डिग्री छपाई का फैसला

मामले की टाइमलाइन भी सवाल खड़े करती है। विश्वविद्यालय का तृतीय दीक्षांत समारोह 6 अक्टूबर 2025 को आयोजित हुआ था। वहीं, डिग्री छपाई को लेकर परीक्षा बोर्ड की बैठक 19 नवंबर 2025 को हुई। इसके बावजूद उपलब्ध जानकारी के अनुसार, प्रिंटर के साथ 13 अगस्त को ही एकरारनामा कर लिया गया था।

यही वजह है कि डिग्री छपाई का काम शुरू करने और विश्वविद्यालय की वैधानिक प्रक्रिया के बीच तालमेल को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

टेंडर प्रक्रिया की अनदेखी का आरोप

विश्वविद्यालय में प्रश्नपत्रों की छपाई को गोपनीय कार्य माना जाता है, जबकि डिग्री की छपाई के लिए ऐसी गोपनीयता की आवश्यकता नहीं होती। आरोप है कि डिग्री छपाई के लिए सेल-परचेज कमेटी, वित्त समिति समेत संबंधित वैधानिक समितियों की सहमति और इसके बाद टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से प्रिंटर का चयन किया जाना चाहिए था।

लेकिन आरोप है कि इस प्रक्रिया का पालन किए बिना सीधे नॉमिनेशन के आधार पर उत्तर प्रदेश की कंपनी को काम दे दिया गया।

स्पेशल ऑडिट टीम को फाइल नहीं देने का भी आरोप

मामले को लेकर एक और सवाल यह है कि विश्वविद्यालय में चल रही स्पेशल ऑडिट प्रक्रिया के दौरान इस काम से संबंधित फाइल ऑडिट टीम को उपलब्ध नहीं करायी गयी। यदि ऐसा हुआ है, तो इससे प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

वहीं, पूरे मामले में परीक्षा नियंत्रक अजीत सेठ और ओएसडी गौरव कुमार की भूमिका भी सवालों के घेरे में बतायी जा रही है। आरोप है कि दोनों की मदद से कुलपति स्तर से इस पूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।

परीक्षा नियंत्रक की नियुक्ति पर भी सवाल

कुलपति दिनेश सिंह पर परीक्षा नियंत्रक अजीत सेठ की नियुक्ति को लेकर भी आरोप लगाए जा रहे हैं। आरोप है कि उन्हें राज्यपाल की सहमति के बिना परीक्षा नियंत्रक बनाया गया, जबकि पूर्व में राज्यपाल की स्वीकृति से नियुक्त परीक्षा नियंत्रक को समय से पहले पद से हटा दिया गया।

अब डिग्री छपाई के मामले और परीक्षा नियंत्रक की नियुक्ति को लेकर उठ रहे सवालों के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। मामले में संबंधित दस्तावेजों और फाइलों की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि डिग्री छपाई में निर्धारित नियमों और वित्तीय प्रक्रियाओं का कितना पालन हुआ।