नरेंद्र मोदी के जनसेवा के बेमिसाल 25 वर्ष : सत्ता की नहीं, सेवा की यात्राBy Mid Time Bureau Fri, 18 September 2026 12:56 PM


सेवा से सुशासन तक, झारखंड के विकास से विकसित भारत की अनवरत यात्रा
बाबूलाल मरांडी

 

17 सितंबर को देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी 76 वर्ष के हो जाएंगे। यह तिथि दो मायनों में विशेष है। एक तो सृष्टि शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा की जन्म जयंती का पावन अवसर और दूसरा नए भारत के शिल्पकार देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का जन्मदिन। भारतीय राजनीति के सार्वजनिक जीवन में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनका जीवनकाल केवल पद और सत्ता तक सीमित नहीं रहता बल्कि वह अपने ऐतिहासिक  कार्यों से करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों की यात्रा इसी संकल्प, सेवा और राष्ट्र निर्माण की कहानी है। सार्वजनिक जीवन में किसी व्यक्ति की उपलब्धियों का इतना लंबा कालखंड सामान्य पड़ाव नहीं होता। यह उस विचार, कार्यशैली और नेतृत्व की परीक्षा का अवसर होता है, जिसने देश की राजनीति और शासन को प्रभावित किया हो। नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

7 अक्टूबर, 2001 को नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। इसके बाद लगभग 13 वर्षों तक गुजरात का नेतृत्व और फिर 2014 से देश के प्रधानमंत्री के रूप में निरंतर सेवा। यह यात्रा केवल पदों की यात्रा नहीं है, बल्कि एक कार्यकर्ता से मुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बनने तक सेवा को राजनीति का आधार बनाने की यात्रा है। प्रधानमंत्री के रूप में 25 वें वर्ष में प्रवेश करते हुए स्वयं नरेंद्र मोदी ने भी इसे देशवासियों के विश्वास और आशीर्वाद के प्रति कृतज्ञता का अवसर बताया था।
आज जब हम इस यात्रा को देखते हैं तो एक बात स्पष्ट दिखाई देती है कि मोदी के लिए विकास केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि सामान्य नागरिक के जीवन में दिखाई देने वाला परिवर्तन है।

राजनीति का केंद्र बदला, प्राथमिकताएँ बदलीं

एक समय देश में सरकार की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जनधन खातों से लेकर प्रत्यक्ष लाभ अंतरण तक, उज्ज्वला से लेकर स्वच्छ भारत तक, आयुष्मान भारत से लेकर जल जीवन मिशन तक, गरीबों के आवास से लेकर डिजिटल सेवाओं तक, सरकार ने योजनाओं की पहुँच को अंतिम छोर तक ले जाने का प्रयास किया। यह बदलाव केवल योजनाओं की संख्या का नहीं है। असली बदलाव यह है कि गरीब, किसान, महिला, युवा और वंचित समाज विकास की चर्चा के केंद्र में आए। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने “सबका साथ, सबका विकास” को शासन की राजनीतिक भाषा बनाया। आज इसी सोच का विस्तार “विकसित भारत@2047” के संकल्प में दिखाई देता है।

झारखंड के लिए मोदी युग का अर्थ

झारखंड की राजनीति और समाज को समझने वाला व्यक्ति यह अच्छी तरह जानता है कि इस राज्य की सबसे बड़ी विडंबना क्या रही है। हमारे पास अपार खनिज संपदा है, जल-जंगल-जमीन है, मेहनतकश लोग हैं, समृद्ध जनजातीय संस्कृति है, लेकिन दशकों तक बुनियादी सुविधाओं और बड़े संस्थानों के मामले में झारखंड अपेक्षाकृत पीछे रहा। ऐसे में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के कार्यकाल में झारखंड में जिन बड़ी परियोजनाओं को गति मिली, उनका महत्व केवल किसी एक शहर या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। वे राज्य की विकास-यात्रा की दिशा बदलने वाली परियोजनाएँ हैं।
देवघर एम्स इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। केंद्र सरकार ने 2018 में देवघर में एम्स स्थापित करने की मंजूरी दी थी, जिसके लिए ₹1,103 करोड़ का प्रावधान किया गया था। प्रस्तावित संस्थान में 750 बेड का अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, नर्सिंग कॉलेज तथा सुपर-स्पेशियलिटी सुविधाओं का प्रावधान किया गया।
2022 में देवघर में एम्स की इन-पेशेंट और ऑपरेशन थिएटर सेवाओं की शुरुआत तथा विभिन्न विकास परियोजनाओं के उद्घाटन-शिलान्यास ने यह संदेश दिया कि झारखंड में भी देश के सर्वोच्च चिकित्सा संस्थानों की सुविधाएँ उपलब्ध हो सकती हैं। उसी अवसर पर देवघर में 16,800 करोड़ रुपए से अधिक की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास हुआ।

देवघर एयरपोर्ट : बाबा धाम से विकास की नई उड़ान

देवघर एयरपोर्ट केवल एक हवाई अड्डा नहीं है। यह झारखंड की धार्मिक पर्यटन क्षमता, व्यापार, रोजगार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए एक नया द्वार है। 12 जुलाई 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देवघर एयरपोर्ट का उद्घाटन किया। लगभग ₹400 करोड़ की लागत से विकसित इस एयरपोर्ट में DRDO की ओर से ₹200 करोड़ का अनुदान भी शामिल था। इसके बाद दिल्ली-देवघर सीधी हवाई सेवा शुरू हुई। केंद्र सरकार ने उस समय यह भी बताया था कि झारखंड में अन्य हवाई संपर्कों के विस्तार पर काम किया जा रहा है।
इसका अर्थ केवल इतना नहीं कि अब लोग विमान से देवघर पहुँच सकते हैं। इसका अर्थ है कि बाबा बैद्यनाथ धाम की अर्थव्यवस्था, होटल उद्योग, स्थानीय व्यापार, पर्यटन और रोजगार के लिए नए अवसरों का दरवाजा खुला है।

बिरसा मुंडा को झारखंड से निकालकर राष्ट्रीय चेतना का नायक बनाना

झारखंड की आत्मा को समझना हो तो भगवान बिरसा मुंडा को समझना होगा। वे केवल एक जनजातीय नायक नहीं, बल्कि स्वाभिमान, संघर्ष और स्वतंत्रता के प्रतीक हैं।
नरेंद्र मोदी सरकार ने भगवान बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को “जनजातीय गौरव दिवस” के रूप में मनाने का निर्णय लिया। 15 नवंबर 2021 को रांची में भगवान बिरसा मुंडा स्मृति उद्यान सह स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय का उद्घाटन भी हुआ।
इस निर्णय का राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत बड़ा है। जिस राज्य में बिरसा मुंडा ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी, उसी राज्य से उनकी स्मृति को राष्ट्रीय गौरव के रूप में स्थापित करना यह बताता है कि भारत का इतिहास केवल कुछ चुनिंदा अध्यायों का इतिहास नहीं है। जनजातीय समाज के संघर्ष, बलिदान और योगदान भी भारतीय राष्ट्र की निर्माण गाथा के अभिन्न हिस्से हैं। यही कारण है कि जनजातीय गौरव दिवस केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि इतिहास के पुनर्पाठ और जनजातीय अस्मिता को सम्मान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

झारखंड के लिए विकास का मतलब केवल खनिज नहीं

झारखंड को लंबे समय तक खनिजों की भूमि के रूप में देखा गया। लेकिन आज आवश्यकता है कि झारखंड को मानव संसाधन, पर्यटन, स्वास्थ्य, शिक्षा, तकनीक और जनजातीय प्रतिभा की भूमि के रूप में भी पहचाना जाए। मोदी सरकार की नीतियों ने इस दिशा में आधार तैयार किया है। देवघर में एम्स स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत करता है। एयरपोर्ट पर्यटन और व्यापार को गति देता है। जनजातीय गौरव दिवस और बिरसा संग्रहालय हमारी पहचान और इतिहास को राष्ट्रीय विमर्श में स्थापित करते हैं। लेकिन हमें यहीं रुकना नहीं है। इन परियोजनाओं को रोजगार, निवेश और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना होगा। झारखंड के युवाओं को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला बनाना होगा। हमारी जनजातीय प्रतिभाओं को शिक्षा और तकनीक से जोड़ना होगा। हमारे पर्यटन स्थलों को विश्वस्तरीय सुविधाओं से जोड़ना होगा।
मोदी जी की विकास दृष्टि का लाभ झारखंड को तभी पूरी तरह मिलेगा, जब राज्य सरकार भी उसी गति, पारदर्शिता और इच्छाशक्ति के साथ काम करे।

निर्णय लेने का साहस भी मोदी युग की पहचान

नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों को केवल विकास योजनाओं से समझना अधूरा होगा। इस दौर में कई ऐसे निर्णय हुए, जिन्होंने देश की राजनीति और नीति की दिशा पर गहरा प्रभाव डाला। अनुच्छेद 370 में बदलाव, नई शिक्षा नीति, जीएसटी, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आत्मनिर्भर भारत, रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण, महिला सशक्तीकरण से जुड़े कानून, गरीब कल्याण की योजनाएँ और कोविड महामारी के दौरान बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान—इन सभी ने भारत के शासन मॉडल को प्रभावित किया। इन निर्णयों पर राजनीतिक मतभेद और बहस लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं। लेकिन यह स्वीकार करना होगा कि नरेंद्र मोदी ने निर्णय लेने वाली सरकार और दीर्घकालीन लक्ष्य वाली राजनीति की संस्कृति को मजबूत किया।

दुनिया में बढ़ा भारत का आत्मविश्वास

पिछले वर्षों में भारत की वैश्विक भूमिका भी बदली है। जी-20 की अध्यक्षता से लेकर वैश्विक दक्षिण की आवाज उठाने तक, भारत ने स्वयं को केवल वैश्विक व्यवस्था का दर्शक नहीं, बल्कि उसमें सक्रिय भूमिका निभाने वाले देश के रूप में प्रस्तुत किया है। आज भारत की अर्थव्यवस्था, डिजिटल क्षमता, अंतरिक्ष कार्यक्रम, रक्षा उत्पादन और वैश्विक कूटनीति पर दुनिया की नजर है। यह बदलाव केवल दिल्ली की कहानी नहीं है। जब भारत मजबूत होता है तो झारखंड जैसे राज्यों के लिए भी निवेश, बाजार, बुनियादी ढाँचे और रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।

25 वर्ष का पड़ाव, अगले 25 वर्षों का संकल्प

नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने का अर्थ यह नहीं कि यात्रा पूरी हो गई। वास्तव में यह अगले और अधिक महत्वपूर्ण चरण की शुरुआत है। 2047 में जब भारत अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी मनाएगा, तब हमारा लक्ष्य केवल बड़ा भारत नहीं, बल्कि विकसित, आत्मनिर्भर, सक्षम और आत्मविश्वासी भारत होना चाहिए। झारखंड के लिए इस लक्ष्य का अर्थ और भी बड़ा है। हमें अपने संसाधनों का उपयोग करते हुए पर्यावरण और विकास में संतुलन बनाना होगा। जनजातीय समाज को विकास की मुख्यधारा में भागीदार बनाना होगा। युवाओं को शिक्षा और रोजगार देना होगा। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ानी होगी। स्वास्थ्य और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारनी होगी।
और इसके लिए केंद्र और राज्य के बीच राजनीतिक टकराव नहीं, बल्कि झारखंड के हित में विकास की साझेदारी आवश्यक है।

सेवा से सुशासन और सुशासन से विकसित भारत

नरेंद्र मोदी की 25 वर्षों की सार्वजनिक यात्रा को यदि एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है—यह सत्ता की यात्रा से अधिक सेवा की यात्रा रही है। गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक का सफर यह बताता है कि राजनीति में निरंतरता, परिश्रम और स्पष्ट लक्ष्य के साथ लंबे समय तक काम किया जा सकता है।
झारखंड के लिए इस यात्रा की सबसे बड़ी सीख यह है कि विकास केवल घोषणाओं से नहीं आता। उसके लिए नेतृत्व, निर्णय, संसाधन और सबसे बढ़कर राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए। देवघर का एम्स, देवघर एयरपोर्ट, भगवान बिरसा मुंडा को समर्पित राष्ट्रीय सम्मान और जनजातीय गौरव दिवस—ये झारखंड में बदलते विकास और बदलती राष्ट्रीय सोच के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं।
25 वर्ष पहले नरेंद्र मोदी ने शासन की जिम्मेदारी संभाली थी। आज 25 वर्ष बाद उनके सामने विकसित भारत का लक्ष्य है। यह यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है। सेवा से सुशासन, सुशासन से सशक्तिकरण और सशक्तिकरण से विकसित भारत—यही नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों की यात्रा का सार है और यही आने वाले भारत का संकल्प भी। और झारखंड इस संकल्प में केवल सहभागी नहीं, बल्कि विकसित भारत की नींव के महत्वपूर्ण राज्यों में से एक बनने की पूरी क्षमता रखता है।

(लेखक : बाबूलाल मरांडी, नेता प्रतिपक्ष, झारखंड विधानसभा)