
रांची: झारखंड की जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और अधिकारों की मांग को लेकर मंगलवार को राजधानी रांची में झारखंडी भाषा बचाओ यात्रा निकाली गई। जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा के नेतृत्व में मोरहाबादी मैदान से शुरू हुई यह यात्रा अल्बर्ट एक्का चौक होते हुए भगवान बिरसा मुंडा समाधि स्थल तक पहुंची। इसमें राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए विद्यार्थियों, शोधार्थियों, प्रोफेसरों, साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया।
यात्रा में शामिल मुंडारी, कुड़ुख, हो, खड़िया, संताली, नागपुरी, कुरमाली, खोरठा और पंचपरगनिया भाषा के छात्र-छात्राओं ने पारंपरिक वेशभूषा और अपने समुदाय के प्रतीक चिह्नों के माध्यम से झारखंड की भाषाई विविधता और सांस्कृतिक एकजुटता का संदेश दिया। प्रदर्शनकारियों ने झारखंडी भाषाओं की पढ़ाई, शिक्षकों की नियुक्ति और भाषाई अधिकारों को सुनिश्चित करने की मांग उठाई।
इस यात्रा में पूर्व शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की, जेएलकेएम के केंद्रीय वरीय उपाध्यक्ष देवेंद्र नाथ महतो, संरक्षक डॉ. हरि उरांव, डॉ. खलील अहमद, डॉ. शकुंतला मिश्रा, डॉ. वृंदावन महतो, संयोजक पप्पू कुमार महतो, डॉ. सरस्वती गगराई, डॉ. दिनेश दिनमणि समेत कई शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए।
क्लस्टर सिस्टम से भाषाओं को बाहर रखने की मांग
मोर्चा ने राज्य सरकार के समक्ष 13 सूत्री मांगें रखीं। इनमें क्लस्टर सिस्टम से जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं को बाहर रखने, विद्यालयों में भाषा शिक्षकों के पद सृजित कर विषयवार नियुक्ति करने और केजी से पीजी तक झारखंडी भाषाओं की पढ़ाई सुनिश्चित करने की मांग प्रमुख रही। इसके अलावा प्रत्येक विश्वविद्यालय में अलग भाषा विभाग स्थापित करने, भाषा संरक्षण के लिए विशेष बजट और समग्र भाषा नीति बनाने की भी मांग की गई।
मोर्चा ने बीएड कॉलेजों में भाषा कोटा और लैंग्वेज लैब की स्थापना, विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति एवं शोध सहायता देने तथा झारखंडी भाषा-साहित्य के मानकीकरण और डिजिटल अभिलेखीकरण पर भी जोर दिया। साथ ही प्रशासन और न्याय व्यवस्था में क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में इन भाषाओं को उचित प्रतिनिधित्व देने की मांग उठाई गई।
इसके अलावा झारखंड भाषा-साहित्य अकादमी की स्थापना और कुड़ुख, मुंडारी, हो, खड़िया, नागपुरी, कुरमाली, खोरठा एवं पंचपरगनिया भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए प्रभावी पहल करने की मांग की गई।
मांगें पूरी नहीं हुईं तो जारी रहेगा आंदोलन
यात्रा का समापन मोरहाबादी स्थित रांची विश्वविद्यालय के दीक्षांत मंडप में राष्ट्रगान के साथ हुआ। यहां उपस्थित लोगों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि जब तक झारखंडी भाषाओं के संरक्षण, पढ़ाई, शिक्षक नियुक्ति और भाषाई अधिकारों से जुड़ी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
मोर्चा ने कहा कि यह किसी एक संगठन का आंदोलन नहीं, बल्कि झारखंड की भाषा, संस्कृति, परंपरा और अस्मिता को बचाने की सामूहिक लड़ाई है। संगठन ने राज्य सरकार से मांगों पर गंभीरता से विचार कर सकारात्मक निर्णय लेने की अपील की।