हिंदुत्व, मंडल और नई सामाजिक राजनीति: क्या भाजपा बदल रही है अपनी रणनीति?By Admin Wed, 04 February 2026 07:14 AM









नित्यानंद शुक्ला
रांची: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) लंबे समय तक हिंदुत्व की राजनीति का सबसे प्रमुख चेहरा रही है। राम मंदिर आंदोलन से लेकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तक, पार्टी ने अपनी पहचान “कमंडल” की राजनीति के जरिए मजबूत की। लेकिन हाल के वर्षों में, खासकर 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद, भाजपा की रणनीति में एक नया बदलाव दिखाई दे रहा है। अब पार्टी केवल हिंदुत्व पर निर्भर नहीं दिखती, बल्कि मंडल यानी ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों के सामाजिक समीकरण को भी मजबूती से साधने की कोशिश कर रही है।

1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों ने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी। ओबीसी आरक्षण लागू होने के बाद जातीय राजनीति तेज हुई। उसी दौर में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा ने राम मंदिर आंदोलन के जरिए हिंदुत्व का बड़ा नैरेटिव खड़ा किया, जिसने पार्टी को 1991 में मुख्य विपक्ष और बाद में 1998 व 1999 में सत्ता तक पहुंचाया। तब से भाजपा को एक ऐसी पार्टी के रूप में देखा गया जो पहचान की राजनीति से ऊपर उठकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को प्राथमिकता देती है।

2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने एक नया मॉडल पेश किया हिंदुत्व के साथ विकास और कल्याणकारी योजनाओं का मिश्रण। मोदी स्वयं ओबीसी पृष्ठभूमि से आते हैं और पार्टी ने गैर-यादव ओबीसी, दलित और वंचित वर्गों को अपने सामाजिक गठबंधन में जोड़ने की रणनीति अपनाई। 2019 में यह रणनीति सफल रही, लेकिन 2024 के चुनावों में भाजपा की सीटों में आई कमी ने पार्टी को नए सिरे से सामाजिक समीकरण पर सोचने के लिए मजबूर किया।

2024 के लोकसभा चुनावों के बाद राजनीतिक विश्लेषकों ने यह सवाल उठाया कि क्या भाजपा को सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के कुछ वोटों में निराशा का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर, कई राज्यों में एससी, एसटी और ओबीसी वोटों के ध्रुवीकरण की चर्चा भी तेज हुई। भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह अपने पारंपरिक ऊंची जाति के समर्थन आधार को बनाए रखते हुए नए सामाजिक समूहों को कैसे संतुलित करे।

हाल में आई यूजीसी (UGC) से जुड़ी गाइडलाइन और सामाजिक प्रतिनिधित्व पर बढ़ती बहस ने भी राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया है। कुछ राज्य सरकारों ने इन्हें अपने स्तर पर लागू करने की कोशिश की, जिससे आरक्षण और प्रतिनिधित्व को लेकर नए विमर्श शुरू हुए। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव की राजनीति को कई लोग ओबीसी वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखते हैं। हालांकि इस पर अलग-अलग राजनीतिक मत हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि राज्य स्तर पर भाजपा के भीतर सामाजिक समीकरणों के अलग-अलग मॉडल उभर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को अपेक्षाकृत कठोर हिंदुत्व की राजनीति का चेहरा माना जाता है। उनके राजनीतिक संदेश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सुरक्षा जैसे मुद्दे प्रमुख रहते हैं। वहीं मध्य प्रदेश में मोहन यादव की राजनीति में ओबीसी प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर अधिक जोर दिखाई देता है। यह भाजपा के भीतर बहुस्तरीय रणनीति की ओर इशारा करता है, जहां अलग-अलग राज्यों में अलग सामाजिक समीकरण साधे जा रहे हैं।

केंद्र सरकार द्वारा जाति आधारित आंकड़ों और सामाजिक प्रतिनिधित्व पर बढ़ती चर्चा ने भी भाजपा की राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। कुछ विश्लेषक इसे पार्टी की व्यावहारिक रणनीति बताते हैं, जबकि आलोचक इसे विचारधारा में बदलाव के संकेत के रूप में देखते हैं। हालांकि भाजपा अभी भी हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को अपनी मुख्य पहचान बताती है, लेकिन अब वह सामाजिक न्याय और ओबीसी प्रतिनिधित्व के मुद्दों को भी समानांतर रूप से आगे बढ़ा रही है।

भाजपा की मौजूदा रणनीति को “मंडल और कमंडल” के नए संतुलन के रूप में देखा जा सकता है। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह जनरल कैटेगरी के मतदाताओं की संभावित निराशा को दूर करते हुए एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के बीच अपना आधार मजबूत रखे। आने वाले वर्षों में यह संतुलन ही तय करेगा कि भाजपा की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी

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