
ज्ञान रंजन/रांची: आखिरकार बिहार में वर्षों के इंतजार के बाद भाजपाराज का सपना साकार हुआ है। बिहार मे भाजपा का सम्राट स्थापित हो गया है। वर्षों से जदयू के साथ सरकार मे तो भाजपा थी लेकिन एक कसक थी कि कब सत्ता की स्टेयरिंग अपने हाथों मे आए। वो कसक आज समाप्त हो गई। भाजपा ने ऐसा ताना-बाना बुना कि नीतीश कुमार खुद आगे बढ़कर भाजपा के सम्राट को पाटलिपुत्र का साम्राज्य सौंप दिया। सम्राट भाजपा से मुख्यमंत्री जरूर बने हैं लेकिन उन्हें सत्ता के शीर्ष पर बैठानेवाले नीतीश कुमार ही हैं। नीतीश ने अपना वारिश सम्राट को तो बना दिया है लेकिन उनके दोनों तरफ लगाम भी कस दी है। सम्राट की चौधराहट पर निगरानी के लिए नीतीश ने अपने चौधरी और यादव को उनके दायें-बाएं खड़ा कर दिया है। बिहार मे लव-कुश समीकरण कायम रहे इसको तो नीतीश कुमार ने सम्राट को मुख्यमंत्री बनाकर संदेश दे दिया है, साथ ही एक ऐसी व्यवस्था भी कर दी है कि बिहार के विकास के लिए मुख्यमंत्री रहते नीतीश कुमार ने जो सात निश्चय लिया था उसकी भी पहरेदारी हो सके। सम्राट चौधरी ने आज दो उपमुख्यमंत्री के साथ मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। दोनों ही उपमुख्यमंत्री जदयू से हैं। नीतीश ने जिन्हे उपमुख्यमंत्री बनाया है वे बिहार की राजनीति के मंझे हुए कलाकार हैं। सबसे बड़ी बात यह भी है कि दोनों ही नीतीश कुमार के लंबे समय से सहयोगी तो हैं ही सबसे बड़े वफादार भी हैं।
विजय चौधरी और बीजेन्द्र यादव ही क्यों बने उपमुख्यमंत्री ?
बिहार की सियासत मे नेतृत्व परिवर्तन के साथ लगातार यह चर्चा हो रही थी कि नीतीश कुमार के पुत्र निशांत उपमुख्यमंत्री तो जरूर बनाए जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब यह कहा जा रहा है कि निशांत ने उपमुख्यमंत्री बनने से इनकार कर दिया और उन्होनें संगठन मे काम करने का मन बनाया है। हो सकता है कि इसमें सच्चाई भी हो। नीतीश कुमार के पाँच दशक से ज्यादा के राजनीतिक करियर को देखते हुए यह माना भी जा सकता है कि वह अपने पुत्र को सरकार मे नहीं लाने का निर्णय लिए होंगे। वजह साफ है कि नीतीश कुमार परिवारवाद का विरोध करके ही बिहार की सत्ता पर काबिज हुए थे। जिस चीज का नीतीश कुमार ने जीवनभर विरोध किया, राजनीति की अंतिम पाली मे वह भी वही काम करें, इसकी कल्पना भी नीतीश जैसे सिजाण्ड नेता से नहीं की जा सकती। अब सवाल यह उठता है कि उपमुख्यमंत्री के रूप मे नीतीश ने विजय चौधरी और बृजेन्द्र यादव को ही क्यों पसाद किया। पहले तो यह समझ लीजिए कि नीतीश की राजनीति को आसानी से समझ लेना बड़े-बड़ों के लिए आसान नहीं है। नीतीश कुमार ने भले ही सत्ता की बागडोर भाजपा के हाथों मे सूप दी है लेकिन सरकार ने भाजपा को एकतरफा निर्णय लेने के लिए नहीं छोड़ा है। बिहार के लिए जो भी नीतिगत निर्णय होगा वो नीतीश को किसी भी कीमत पर अंधेरे मे रखकर नहीं लिया जाएगा। जिन दो नेताओं को नीतीश ने सम्राट कैबिनेट मे उपमुख्यमंत्री बनवाया है दोनों का राजनीतिक इतिहास बहुत पुराना है। साथ ही दोनों ही नेताओं के पास सरकार मे काम करने का भी लंबा अनुभव है। दोनों ही उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पिता शकुनि चौधरी के साथ राजनीति भी किए हैं। सम्राट सरकार के हर निर्णय पर कठोर निगहबानी के लिए ही नीतीश कुमार ने विजय चौधरी और बीजेन्द्र यादव को उपमुख्यमंत्री बनाया है।
एक साथ साधा जातीय समीकरण
बिहार की राजनीति मे जातीय समीकरण बहुत मायने रखता है। लालू राज को समाप्त करने के लिए नीतीश कुमार ने लव-कुश और सामान्य समीकरण को लेकर एक ऐसा सोशल इंजीनियरिंग तैयार किया जिसके आगे लालू के माई समीकरण को धवस्त किया जा सका। लालू के कमजोर होने के बाद नीतीश ने जहां अपने समीकरण को मजबूत किया और विकास की एक बड़ी रेखा बिहार मे खींची वहीं भाजपा के साथ मिलकर सवर्णों, दलितों और लव-कुश समीकरण के माध्यम से एक बड़े वोट बैंक को अपने साथ कर लिया। सम्राट को मुख्यमंत्री बनाकर उन्होनें लव-कुश समीकरण को बिगड़ने नहीं दिया वहीं विजय चौधरी और बृजेन्द्र यादव को उपमुख्यमंत्री बनाकर सवर्ण और पिछड़ी जाति को भी एक साथ साध लिया है। दलितों की जहां तक बात है चिराग पासवान और जितन राम मांझी उनके साथ तो है ही। पिछले तीन चुनाओं से यह भी देखा जा रहा है कि आधी आबादी का समर्थन नीतीश कुमार को खुलकर मिल ही रहा है।