215 से 20 तक का सफर: ममता बनर्जी की राजनीति के उत्थान और संकट की कहानीBy Admin Thu, 04 June 2026 11:07 AM

नित्यानंद शुक्ल/कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी का उदय भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी राजनीतिक कहानियों में गिना जाता है। कभी कांग्रेस की युवा नेता रहीं ममता ने 1998 में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना की और धीरे-धीरे 34 वर्षों से सत्ता पर काबिज वाममोर्चा के खिलाफ जनआंदोलन खड़ा किया। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों ने उन्हें किसानों और ग्रामीण बंगाल की सबसे प्रभावशाली आवाज बना दिया।

2011 का विधानसभा चुनाव बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ। टीएमसी ने कांग्रेस के साथ मिलकर 294 सदस्यीय विधानसभा में 184 सीटें जीतकर वामपंथी शासन का अंत कर दिया। 2016 में ममता बनर्जी का जनाधार और मजबूत हुआ तथा टीएमसी ने 211 सीटों पर विजय हासिल की। 2021 में भाजपा की कड़ी चुनौती के बावजूद टीएमसी ने 213 सीटें जीतकर लगातार तीसरी बार सरकार बनाई और ममता बनर्जी ने अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया।

हालांकि इसके बाद राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदलीं। विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा कि टीएमसी ने मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति को बढ़ावा दिया, जिससे सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ा। भाजपा ने सीमा पार अवैध घुसपैठ को भी बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया और राज्य सरकार पर इस मामले में नरम रुख अपनाने का आरोप लगाया। टीएमसी ने हमेशा इन आरोपों को खारिज करते हुए अपनी नीतियों को समावेशी और कल्याणकारी बताया।

पार्टी के भीतर भी असंतोष बढ़ने लगा। कई वरिष्ठ नेताओं ने संगठन में बढ़ते केंद्रीकरण और अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव पर सवाल उठाए। आलोचकों का आरोप रहा कि निर्णय प्रक्रिया कुछ लोगों तक सीमित हो गई, जबकि समर्थकों का कहना है कि अभिषेक ने संगठन को आधुनिक और युवा नेतृत्व से जोड़ने का प्रयास किया।

हालिया राजनीतिक घटनाक्रम ने टीएमसी के संकट को और गहरा कर दिया है। बागी विधायकों के एक नए समूह के उभरने के बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष रथींद्र बोस ने बुधवार को कथित तौर पर टीएमसी विधायक दल के नए ब्लॉक को आधिकारिक तृणमूल कांग्रेस ब्लॉक तथा विधानसभा में प्रमुख विपक्षी दल के रूप में मान्यता देने का निर्णय लिया। इस घटनाक्रम को ममता बनर्जी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।

एक समय 2011 से 2021 के बीच लगातार बढ़ती ताकत के साथ बंगाल की राजनीति पर छाई रहने वाली ममता बनर्जी आज अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन दौर का सामना कर रही हैं। संघर्ष उनकी राजनीति की पहचान रहा है, लेकिन यह संकट तय करेगा कि वह एक बार फिर वापसी कर पाती हैं या बंगाल की राजनीति में किसी नए युग की शुरुआत होने जा रही है।