




नई दिल्ली: भारत की तेज़ और किफायती वैक्सीन निर्माण क्षमता एक बार फिर अफ्रीकी देशों के लिए बड़ी राहत बनकर उभरी है। एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि **भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन (IAFS-IV)** को बुंडीबुग्यो इबोला प्रकोप के कारण स्थगित किए जाने के बाद भारत ने वैक्सीन उत्पादन में तेजी लाकर अफ्रीका के लिए एक भरोसेमंद साझेदार की भूमिका निभाई है।
दक्षिण अफ्रीका स्थित मीडिया संस्थान **आईओएल (IOL)** की रिपोर्ट के अनुसार, 28 से 31 मई के बीच नई दिल्ली में प्रस्तावित शिखर सम्मेलन को बुंडीबुग्यो इबोला वायरस के बढ़ते मामलों के कारण टालना पड़ा। इस घटनाक्रम ने अफ्रीका के लिए आपातकालीन वैक्सीन उपलब्ध कराने में भारत की निर्णायक भूमिका को उजागर किया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि **सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII)** ने तेजी से वैक्सीन निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाकर भारत को अफ्रीका का एक अनिवार्य और भरोसेमंद साझेदार बना दिया है।

**सीईपीआई (Coalition for Epidemic Preparedness Innovations)**, **ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय** और अफ्रीकी साझेदारों के सहयोग से सीरम इंस्टीट्यूट बुंडीबुग्यो इबोला स्ट्रेन के लिए **ChAdOx1** तकनीक पर आधारित वैक्सीन विकसित कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, परीक्षण के लिए क्लीनिकल-ग्रेड वैक्सीन की पहली खेप अगले **दो से तीन महीनों** में तैयार हो सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 महामारी के दौरान भी भारत ने कम लागत पर अरबों वैक्सीन डोज़ उपलब्ध कराकर वैश्विक दक्षिण (Global South), विशेषकर अफ्रीकी देशों की बड़ी मदद की थी। अब इबोला संकट के दौरान भी भारत उसी जिम्मेदारी के साथ आगे आया है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत प्रभावित देशों को किफायती दरों पर वैक्सीन उपलब्ध कराने के साथ-साथ परीक्षण की तैयारी और वितरण व्यवस्था के लिए अफ्रीकी देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है।
इस बीच, **अफ्रीकी संघ (African Union)** और **अफ्रीका सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (Africa CDC)** ने इस प्रकोप को सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करते हुए वर्ष के अंत तक वैक्सीन उपलब्ध कराने के प्रयास तेज कर दिए हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत का सहयोग केवल वैक्सीन तक सीमित नहीं है। भारत ने **बुर्किना फासो** को **1,000 मीट्रिक टन** सहायता सामग्री उपलब्ध कराई है, जबकि **मलावी** और **मोजाम्बिक** को भी मानवीय सहायता प्रदान की है।
हालांकि रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया कि अफ्रीकी देशों को दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए स्थानीय बायोटेक उद्योग में निवेश बढ़ाने, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को प्रोत्साहित करने और एकीकृत नियामकीय ढांचा विकसित करने की आवश्यकता होगी। भारत, सीईपीआई और ऑक्सफोर्ड जैसे साझेदार इस दिशा में महत्वपूर्ण सहयोगी साबित हो सकते हैं।
WIth inputs from IANS


