दक्षिण भारत में 'लीडरलेस कट्टरपंथ' बना नई चुनौती, सुरक्षा एजेंसियां सतर्कBy Admin Fri, 10 July 2026 01:22 PM

नई दिल्ली। दक्षिण भारत में कट्टरपंथ फैलाने का तरीका तेजी से बदल रहा है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार अब ऐसे कई लोग और छोटे-छोटे समूह सामने आ रहे हैं, जिनका किसी प्रतिबंधित आतंकी संगठन से प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, लेकिन वे इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए चरमपंथी विचारधारा का प्रचार कर रहे हैं। इस बदलते स्वरूप ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि ऐसे नेटवर्क की पहचान और निगरानी पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गई है।

हाल के दिनों में विभिन्न जांच एजेंसियों की पड़ताल और दक्षिण भारत के कई राज्यों में की गई छापेमारी से इस नए रुझान के संकेत मिले हैं। एक खुफिया अधिकारी के अनुसार, ऐसे कई युवा किसी आतंकी संगठन के सदस्य नहीं हैं, लेकिन वे इस्लामिक स्टेट (आईएस) और अल-कायदा जैसे संगठनों की विचारधारा से प्रभावित होकर स्वतंत्र रूप से कट्टरपंथी सोच का प्रचार कर रहे हैं। इनमें से अधिकांश लोग किसी भी आतंकी संगठन से आर्थिक या अन्य प्रकार की सहायता नहीं लेते।

अधिकारियों का कहना है कि इन समूहों का कोई संगठित ढांचा नहीं होता और इनके सदस्यों का आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं मिलता। यही कारण है कि इनकी गतिविधियों का पता लगाना और उन पर नजर रखना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि दक्षिण भारत में कट्टरपंथ का मुद्दा लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। उनका कहना है कि समय रहते इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिए जाने के कारण ऐसे तत्व धीरे-धीरे सक्रिय होते गए।

अधिकारियों के अनुसार, पहले पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) जैसे संगठनों के जरिए कट्टरपंथ फैलाने की गतिविधियां अपेक्षाकृत आसानी से निगरानी में आ जाती थीं, क्योंकि उनका स्पष्ट संगठनात्मक ढांचा, कार्यालय और सक्रिय सदस्य मौजूद थे। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) समेत कई एजेंसियों की विस्तृत जांच के बाद पीएफआई पर प्रतिबंध लगाया गया था।

आतंकवाद-रोधी मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि अब कट्टरपंथ फैलाने वाले छोटे-छोटे नेटवर्क किसी संगठन के प्रत्यक्ष नियंत्रण के बिना भी काम कर रहे हैं। कई मामलों में केवल एक व्यक्ति या तीन-चार लोगों का समूह सोशल मीडिया पर लोगों से संपर्क करता है। कुछ ऑनलाइन बातचीत के बाद उन्हें अपनी विचारधारा से प्रभावित करने की कोशिश शुरू हो जाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, ये लोग किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहते, बल्कि देशभर के लोगों से संपर्क साधते हैं। उनका उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच बनाना और फिर उन्हें भी इसी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करना होता है। इस तरह यह प्रक्रिया धीरे-धीरे एक श्रृंखला का रूप ले सकती है।

एक अधिकारी ने बताया कि अब इन नेटवर्कों का तरीका भी बदल रहा है। पहले जहां आतंकी हमलों के लिए उकसाने पर अधिक जोर होता था, वहीं अब समाज की सोच और वैचारिक दृष्टिकोण को बदलने की कोशिश की जा रही है। अधिकारियों के अनुसार, उनका दावा है कि अंतिम उद्देश्य कट्टरपंथी विचारधारा पर आधारित व्यवस्था स्थापित करना है।

अधिकारियों का यह भी कहना है कि फिलहाल इन नेटवर्कों का मुख्य लक्ष्य युवा पुरुष हैं, लेकिन भविष्य में महिलाओं को भी प्रभावित करने की कोशिश की जा सकती है। उनका आकलन है कि महिलाओं के माध्यम से सामाजिक व्यवहार, पारिवारिक मूल्यों और अगली पीढ़ी की सोच को प्रभावित करने का प्रयास किया जा सकता है।

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, जांच में ऐसे कुछ स्वयं संचालित मॉड्यूल में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ विचार भी सामने आए हैं। अधिकारियों का कहना है कि यदि ऐसे नेटवर्क समय रहते नहीं रोके गए, तो इनके देश के अन्य हिस्सों में फैलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

हालांकि, इन आकलनों और दावों पर संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया इस रिपोर्ट में शामिल नहीं है। मामले की जांच विभिन्न एजेंसियों द्वारा जारी है।
 

 

With inputs from IANS