शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस की सख्ती उचित नहीं, पूरे देश के लिए एक समान प्रोटोकॉल जरूरी : सुप्रीम कोर्टBy Admin Mon, 27 July 2026 12:43 PM

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि संविधान द्वारा प्रदत्त शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार हर हाल में सुरक्षित रहना चाहिए और किसी भी आंदोलन के दौरान पुलिस की कथित ज्यादती या प्रदर्शनकारियों द्वारा सुरक्षा बलों पर हमले जैसे मामलों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। अदालत ने संकेत दिया कि सार्वजनिक प्रदर्शनों से निपटने के लिए पूरे देश में एक समान प्रोटोकॉल बनाए जाने की जरूरत है।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ नीट-यूजी 2026 प्रश्नपत्र लीक के विरोध में देशभर में हुए छात्र आंदोलनों से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।

सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल आंदोलन होने के आधार पर पुलिस द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग को सही नहीं ठहराया जा सकता। वहीं, प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमलों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा, "संविधान शांतिपूर्ण और कानूनसम्मत प्रदर्शन का अधिकार देता है। जब तक प्रदर्शन शांतिपूर्ण है, तब तक केवल आंदोलन होने के कारण पुलिस की ओर से बल प्रयोग उचित नहीं माना जा सकता।"

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कहीं पुलिस की ओर से अति हुई है तो उसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि यह केवल दिल्ली का मामला नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए एक समान व्यवस्था आवश्यक है।

सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, "हर आंदोलन का जवाब लाठीचार्ज नहीं हो सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनुशासन बेहद महत्वपूर्ण है और प्रदर्शनों के प्रबंधन के लिए पूरे देश में एक समान प्रोटोकॉल होना चाहिए।"

न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों—दोनों को लगी चोटें समान रूप से चिंता का विषय हैं। उन्होंने कहा कि अदालत राज्य सरकारों से यह भी पूछ सकती है कि ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए पुलिस को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण क्यों उपलब्ध नहीं कराए गए।

अदालत ने सुझाव दिया कि ऐसा स्पष्ट प्रोटोकॉल बनाया जाए, जिससे शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए पर्याप्त स्थान और सुविधा उपलब्ध हो, जबकि उपद्रवी या असामाजिक तत्वों से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने बताया कि छात्र आंदोलनों के दौरान देशभर में हुई हिंसा और पुलिस कार्रवाई से जुड़ी कई याचिकाएं लंबित हैं। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने भी पूरे देश के लिए समान दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की।

राज्यसभा सांसद मनोज झा की ओर से पेश अधिवक्ता फौजिया शकील ने अदालत को बताया कि बिहार में हालिया पुलिस फायरिंग समेत कई घटनाओं से संबंधित विस्तृत तथ्यों के साथ नई याचिका दायर की गई है।

दूसरी ओर, घायल पुलिसकर्मियों के परिजनों की ओर से पेश वकील ने अदालत से सुनवाई में शामिल होने की अनुमति मांगते हुए आरोप लगाया कि कई पुलिसकर्मियों पर भी प्रदर्शन के दौरान गंभीर हमले किए गए।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की ओर से कहा कि सरकार निष्पक्ष तरीके से अदालत की सहायता करेगी और सभी संबंधित याचिकाओं की एक साथ सुनवाई किए जाने का सुझाव दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस सुझाव को स्वीकार करते हुए सभी लंबित याचिकाओं को मंगलवार को एक साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

यह मामला नीट-यूजी 2026 प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा से जुड़े विवादों के विरोध में देशभर में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा कथित अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों से संबंधित है।

इससे पहले सीजेआई सूर्यकांत ने स्पष्ट किया था कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सुनवाई से इनकार नहीं किया था, बल्कि केवल एक पृष्ठ के प्रतिनिधित्व को याचिका के रूप में स्वीकार करने से मना किया था। उन्होंने कहा था कि विधिवत याचिका दायर होने के बाद अदालत ने मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।

उधर, पिछले सप्ताह दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस मामले से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया था। अदालत ने 20 जुलाई को आयोजित 'संसद चलो' मार्च से जुड़े सीसीटीवी फुटेज, वीडियोग्राफी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने माना था कि यदि आरोप किसी बड़े सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई से जुड़े हैं, तो प्रभावित लोगों को अलग-अलग शिकायत दर्ज कराने के लिए कहना उचित नहीं होगा। मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी।