प्रदर्शनकारियों पर फिलहाल कोई कठोर कार्रवाई नहीं: सुप्रीम कोर्टBy Admin Tue, 28 July 2026 01:34 PM

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को संकेत दिया कि वह कथित NEET-UG 2026 पेपर लीक के विरोध में हुए देशव्यापी छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित ज्यादतियों और पुलिसकर्मियों पर हुए हमलों की जांच के लिए सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल (SIT) गठित कर सकता है। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि जिन छात्र प्रदर्शनकारियों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उनके खिलाफ अगली सुनवाई तक कोई दंडात्मक या जबरन कार्रवाई न की जाए।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और वी. मोहन की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग करते हैं। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार तथा असम, बिहार, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की राज्य सरकारों से जवाब मांगा है।
पीठ ने कहा, "याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच का मामला बनाते हैं। ऐसी जांच से सभी आरोपों की प्रभावी ढंग से पड़ताल हो सकेगी।"
नाबालिगों की तत्काल रिहाई के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न राज्यों में प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए सभी नाबालिगों को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। साथ ही यह भी कहा कि केवल प्रदर्शन में भाग लेने के कारण गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए ऐसे छात्रों को भी रिहा किया जाए जिनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राहत आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों पर लागू नहीं होगी।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सुरक्षित रखने का आदेश
अदालत ने प्रदर्शन से जुड़े सभी CCTV फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी-वॉर्न कैमरा फुटेज, वायरलेस संचार, PCR लॉग और अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। साथ ही पुलिस द्वारा एकत्र किए गए छात्र प्रदर्शनकारियों के व्यक्तिगत और डिजिटल डेटा को भी सुरक्षित रखने, लेकिन फिलहाल सार्वजनिक न करने का आदेश दिया।
रिटायर्ड जज की निगरानी में हो सकती है जांच
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि मामले की गहन और पारदर्शी जांच आवश्यक है। अदालत ने संकेत दिया कि केंद्र और राज्यों के जवाब मिलने के बाद सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की निगरानी में एक उच्चस्तरीय समिति या SIT गठित करने पर विचार किया जा सकता है।
प्रदर्शन संबंधी प्रोटोकॉल में बदलाव की जरूरत
पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि सार्वजनिक प्रदर्शनों से जुड़े मौजूदा दिशा-निर्देशों में संशोधन की आवश्यकता हो सकती है। अदालत ने कहा, "लोकतंत्र में ऐसे आंदोलन होना स्वाभाविक है," और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए एक उपयुक्त तंत्र विकसित करने की आवश्यकता बताई।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि मामला केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना नाम-पट्टिका वाले पुलिसकर्मियों द्वारा हिंसा की गई और इस मामले की जांच पूर्व मुख्य न्यायाधीश की निगरानी में कराई जानी चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने प्रदर्शनकारियों पर कथित रूप से इलेक्ट्रिक शॉक बैटन के इस्तेमाल और छात्रों को झूठे मादक पदार्थ मामलों में फंसाने की धमकियों का मुद्दा उठाया।
वरिष्ठ अधिवक्ता शादन फरासत ने कहा कि बिहार में हिंसा की स्थिति दिल्ली से अधिक गंभीर थी और सरकार द्वारा मुकदमे वापस लेने की घोषणा के बावजूद लगभग 150 लोग, जिनमें अधिकांश नाबालिग हैं, अब भी हिरासत में हैं।
अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने स्वयंसेवक जुनैद मलिक का मामला उठाते हुए आरोप लगाया कि उन्हें पुलिस ने हिरासत में लेकर बाद में मसूरी में छोड़ दिया।
केंद्र सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्वतंत्र जांच का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अदालत के समक्ष दो प्रकार की याचिकाएं हैं—एक में छात्रों पर पुलिस की कथित बर्बरता का आरोप है, जबकि दूसरी में पुलिसकर्मियों के घायल होने का मुद्दा उठाया गया है।
उन्होंने कहा, "यदि छात्रों पर हमला हुआ है तो यह गंभीर मामला है और सरकार इसे हल्के में नहीं ले सकती।" साथ ही उन्होंने बताया कि प्रदर्शन के दौरान करीब 250 पुलिसकर्मी भी घायल हुए।
मेहता ने यह भी कहा कि संभव है कि असामाजिक तत्व प्रदर्शन में शामिल हो गए हों और पुलिस पर हमलों के लिए छात्र जिम्मेदार न हों। उन्होंने कहा कि अदालत के सामने सभी पक्षों की सच्चाई सामने आनी चाहिए।
अगली सुनवाई अगले सप्ताह
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह भी जांचना होगा कि पुलिस पर हमला करने वाले वास्तव में छात्र थे या नहीं। मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी।
यह मामला उन याचिकाओं पर सुनवाई से जुड़ा है, जिनमें देशभर में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार की सुरक्षा के लिए समान दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है। इससे पहले सोमवार को भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि शांतिपूर्ण और वैध प्रदर्शन करना संविधान प्रदत्त अधिकार है, और पुलिस ज्यादती तथा पुलिस पर हिंसा—दोनों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।