
विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Bill) को व्यापक विचार-विमर्श और विभिन्न पक्षों की राय लेने के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजे जाने को लेकर बुधवार को भाजपा और विपक्ष के बीच तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिली। भाजपा ने इसे विधेयक को और व्यापक तथा प्रभावी बनाने की दिशा में उठाया गया कदम बताया, जबकि विपक्ष ने केंद्र सरकार पर अल्पसंख्यकों और गैर-सरकारी संगठनों के खिलाफ सुनियोजित कार्रवाई का आरोप लगाया।
लोकसभा ने बुधवार को विपक्ष के भारी हंगामे के बीच सरकार के उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी, जिसके तहत FCRA संशोधन विधेयक को JPC के पास भेजा जाना है। समिति अब विधेयक के प्रावधानों पर विभिन्न हितधारकों और विशेषज्ञों से राय ले सकती है।
भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने आईएएनएस से कहा कि FCRA एक महत्वपूर्ण विधेयक है और इसे व्यापक परामर्श तथा हितधारकों के विचार जानने के लिए JPC को भेजा गया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि समिति की प्रक्रिया के बाद विधेयक और मजबूत तथा बेहतर तरीके से तैयार होगा। उनके मुताबिक, समिति के माध्यम से अधिक हितधारकों से बातचीत, सहमति निर्माण और विशेषज्ञों की राय लेने का अवसर मिलेगा।
भाजपा सांसद नवीन जैन ने FCRA विधेयक को देश की जरूरत बताते हुए कहा कि विदेशी चंदे के इस्तेमाल को लेकर पारदर्शिता और निगरानी जरूरी है। उन्होंने कहा कि सरकार को यह जानने का अधिकार है कि विदेश से मिलने वाले धन का इस्तेमाल किस तरह की गतिविधियों में हो रहा है।
जैन ने कहा कि इस मुद्दे को वोट बैंक की राजनीति के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए और राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
भाजपा नेता प्रतुल शाहदेव ने भी विदेशी फंड के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए निगरानी और संतुलन की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ ईसाई मिशनरी संगठनों पर विदेशी धन का इस्तेमाल धार्मिक रूपांतरण के लिए करने के आरोप लगे हैं और उम्मीद जताई कि यह विधेयक भविष्य में कानून का रूप लेगा।
हालांकि, विपक्ष ने विधेयक को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला। संसद भवन के बाहर पत्रकारों से बातचीत में तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि विधेयक का उद्देश्य गैर-सरकारी संगठनों और धर्मार्थ संस्थाओं के विदेशी वित्त पोषण को सीमित करना है। उन्होंने दावा किया कि इसका असर खास तौर पर ईसाई और मुस्लिम समुदायों से जुड़े संगठनों पर पड़ेगा।
कांग्रेस सांसद हिबी ईडन ने FCRA विधेयक को देश के अल्पसंख्यकों के खिलाफ "सुनियोजित हमला" बताया। उन्होंने कहा कि कई अल्पसंख्यक संगठन आदिवासी और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे हैं और उन्हें विदेशी फंडिंग मिलती है। उनके मुताबिक, प्रस्तावित संशोधन ऐसे सामाजिक संगठनों के काम को प्रभावित कर सकते हैं।
CPI-M नेता हन्नान मोल्ला ने कहा कि सरकार को विपक्ष के दबाव के कारण विधेयक को JPC के पास भेजना पड़ा। उन्होंने विधेयक के मूल प्रावधानों पर आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया कि इसके पीछे अल्पसंख्यक समुदायों की संपत्तियों और संस्थानों को निशाना बनाने की मंशा हो सकती है।
इससे पहले कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने कहा कि सरकार को हंगामे के बीच विधेयक को जबरन पारित कराने के बजाय JPC के पास भेजने का रास्ता अपनाना पड़ा।
FCRA कानून विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए महत्वपूर्ण नियामक ढांचा तय करता है। ऐसे में संशोधन विधेयक को JPC के पास भेजे जाने से अब इसके प्रावधानों पर विस्तृत संसदीय समीक्षा और विभिन्न पक्षों की राय सामने आने की संभावना है। समिति की सिफारिशें विधेयक के अंतिम स्वरूप और आगे की संसदीय प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
With inputs from IANS