
New Delhi: झारखंड भाजपा के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल बुधवार को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष आदित्य साहू और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में पहुंचे प्रतिनिधिमंडल में पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास, अर्जुन मुंडा, चंपाई सोरेन, राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश, पूर्व भाजपा अध्यक्ष रवींद्र राय और संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह शामिल रहे. अमित शाह के साथ मुलाकात के दौरान झारखंड भाजपा के नेताओं ने राज्य की वर्तमान परिस्थिति से उन्हें अवगत कराया। झारखंड में पिछले 25 दिनों से चल रहे छात्र आंदोलन और इसपर सरकार द्वारा उठाए गए कदम से भी उन्हें अवगत कराया गया। हालांकि अमित शाह से मिलनेवाले नेताओं ने इस मुलाकात को महज शिष्टाचार भेंट करार दिया लेकिन जब एक साथ राज्य के तीन-तीन पूर्व मुख्यमंत्री, संगठन मंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और दो पूर्व अध्यक्ष एक साथ मिलने पहुंचे तो यह बड़े राजनीतिक तपिश की और इशारा करता है। वो भी तब जब राज्य का सबसे गर्म राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा JSSC-JPSC भर्ती परीक्षाओं को लेकर पैदा हुआ विवाद है. छात्र आंदोलन के दबाव के बीच राज्य सरकार के परीक्षा और नियुक्ति प्रक्रिया रद्द करने के फैसले के बाद अब चयनित और नियुक्त अभ्यर्थी ही सरकार के सामने खड़े हैं. प्रोजेक्ट भवन के बाहर और परिसर के भीतर इन अभ्यर्थियों का आंदोलन जारी है. कल तक सचिवालय में सरकारी सेवा कर रहे युवा अब सड़क पर बैठकर अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं. ऐसे में अमित शाह से हुई इस मुलाकात को भाजपा की ओर से इस पूरे विवाद को बड़े राजनीतिक मंच पर उठाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
सवाल यह उठ रहा है कि आखिर दिल्ली में क्यों पहुंचा इतना बड़ा भाजपा प्रतिनिधिमंडल? बाबूलाल मरांडी, रघुवर दास, अर्जुन मुंडा और चंपाई सोरेन जैसे बड़े नेताओं का एक साथ अमित शाह से मिलना सामान्य राजनीतिक मुलाकात से अलग महत्व रखता है. प्रतिनिधिमंडल में संगठन और राजनीति, दोनों स्तरों के प्रमुख चेहरे मौजूद रहे. इससे संकेत मिलता है कि भाजपा झारखंड के मौजूदा हालात को गंभीरता से लेकर इसकी जानकारी केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाना चाहती है. JSSC-JPSC भर्ती विवाद इस समय विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का बड़ा मुद्दा बन चुका है. भाजपा का आरोप है कि छात्र आंदोलन के दबाव में सरकार ने ऐसा फैसला लिया, जिसका सीधा असर उन युवाओं पर पड़ा जिन्होंने परीक्षा पास करने के बाद नियुक्ति हासिल की थी. विपक्ष के सामने अब यह सवाल रखने का मौका है कि यदि परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है तो दोषियों की पहचान और कार्रवाई की जाए, लेकिन उन अभ्यर्थियों का भविष्य क्यों प्रभावित किया जाए जिन्होंने पूरी प्रक्रिया में सफल होकर सरकारी नौकरी ज्वाइन की.
अमित शाह के सामने कानून-व्यवस्था से लेकर भर्ती व्यवस्था तक के सवाल
गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात का एक अहम पहलू कानून-व्यवस्था से जुड़ा सवाल भी है. प्रोजेक्ट भवन जैसे महत्वपूर्ण सरकारी परिसर के बाहर और अंदर अभ्यर्थियों का प्रदर्शन, पुलिस की तैनाती और लगातार बढ़ता आक्रोश अब केवल भर्ती परीक्षा का विषय नहीं रह गया है. भाजपा की कोशिश इस पूरे मामले को पारदर्शिता, प्रशासनिक निर्णय और युवाओं के भविष्य से जोड़ने की होगी. सीबीआई जांच की मांग भी पहले से उठती रही है. विपक्ष का तर्क है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यह स्पष्ट होना चाहिए कि परीक्षा में वास्तव में कहां और किस स्तर पर गड़बड़ी हुई. दूसरी ओर, राज्य सरकार का पक्ष यह है कि भर्ती प्रक्रिया में उठे गंभीर सवालों को देखते हुए कार्रवाई जरूरी थी और परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए जांच व सुधार की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है. इस राजनीतिक टकराव के बीच सबसे ज्यादा दबाव उन अभ्यर्थियों पर है जो परीक्षा पास करने के बाद नौकरी कर रहे थे और अब अपने भविष्य को लेकर आंदोलन कर रहे हैं.
दिल्ली की बैठक के बाद झारखंड में और गरमाएगा मुद्दा
अमित शाह से भाजपा प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात के बाद JSSC-JPSC विवाद के और राजनीतिक रूप लेने की संभावना है. अगर केंद्रीय नेतृत्व की ओर से जांच, निगरानी या किसी हस्तक्षेप का संकेत मिलता है तो भाजपा राज्य सरकार पर अपना हमला और तेज कर सकती है. वहीं सरकार इस फैसले को परीक्षा व्यवस्था में सुधार और छात्रों की मांग के अनुरूप उठाया गया कदम बता सकती है. लेकिन उसके सामने सबसे कठिन सवाल नियुक्त अभ्यर्थियों का है. सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि परीक्षा रद्द होने के बाद उन युवाओं के साथ क्या होगा जिन्होंने नियुक्ति पा ली थी और सरकारी सेवा में काम भी शुरू कर दिया था. फिलहाल झारखंड में एक ही फैसले से दो अलग-अलग पक्ष आमने-सामने हैं. छात्र परीक्षा रद्द होने को अपनी जीत मान रहे हैं, जबकि नियुक्त अभ्यर्थी उसी फैसले को अपने भविष्य पर चोट बता रहे हैं. प्रोजेक्ट भवन का आंदोलन अभी थमा नहीं है और अब दिल्ली में हुई भाजपा की इस मुलाकात ने विवाद को एक नया राजनीतिक आयाम दे दिया है.