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पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ओपी रावत ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को बेहद गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। उन्होंने कहा कि वैधानिक मतदाता पंजीकरण फॉर्म-6 में उचित कानूनी प्रक्रिया के बिना बदलाव किया गया है तो यह गलत और गैरकानूनी होगा।
रावत की यह टिप्पणी उस मीडिया रिपोर्ट के बाद आई है, जिसमें दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, ये आपत्तियां मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव तथा मतदाता सूची के डेटा पर नियंत्रण को लेकर थीं।
रावत ने भोपाल में IANS से कहा कि अगर आयोग के भीतर अलग-अलग राय थी, तो तीनों चुनाव आयुक्तों को साथ बैठकर पूरे मामले को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है और उसके फैसले आम सहमति या बहुमत के आधार पर लिए जाने चाहिए।
उन्होंने कहा, "चुनाव आयोग का कोई फैसला केवल सर्वसम्मति या बहुमत से लिया जा सकता है, इसके अलावा किसी अन्य तरीके से नहीं।"
2018 में मुख्य चुनाव आयुक्त रह चुके रावत ने खास तौर पर फॉर्म-6 में कथित बदलाव को गंभीर मुद्दा बताया। फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज कराने के लिए किया जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, SIR से जुड़े कुछ सवाल इस फॉर्म में जोड़े गए थे, जबकि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कथित तौर पर कहा था कि वैधानिक फॉर्म में बदलाव के लिए संबंधित नियमों में संशोधन जरूरी है।
रावत ने SIR की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बिहार से शुरू हुए इस अभियान में शुरुआत से ही कई समस्याएं सामने आईं और बाद में चुनाव आयोग ने प्रक्रिया को बेहतर और सुगम बनाने की कोशिश की। उनके मुताबिक, मतदाता सूची में संशोधन के दौरान हुई किसी भी गलती के कारण किसी योग्य नागरिक का मतदान का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए।
पश्चिम बंगाल के SIR का उदाहरण देते हुए रावत ने कहा कि बड़ी संख्या में हटाए गए मतदाताओं के नाम बाद में बहाल किए जाने से यह पता चलता है कि पुनरीक्षण प्रक्रिया में त्रुटियों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों में बड़ी संख्या में अपीलें भी लंबित हैं।
इस बीच, मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस विवाद को लेकर भाजपा सरकार पर राजनीतिक हमला बोला। उन्होंने दावा किया कि दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। सिंघार ने फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता डेटा के केंद्रीकरण और मतदाताओं के नाम जोड़ने-हटाने से जुड़े मामलों पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा।
हालांकि, चुनाव आयोग ने इन आरोपों और कथित अंदरूनी मतभेदों के बीच स्पष्ट किया है कि पिछले एक वर्ष में उसके सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा है कि किसी संस्था के भीतर विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां सामने आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि SIR सीधे मतदाता सूची की शुद्धता और योग्य नागरिकों के मतदान के अधिकार से जुड़ा है। ऐसे में फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता डेटा के प्रबंधन और नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों पर चुनाव आयोग की ओर से स्पष्टता महत्वपूर्ण होगी।