म्यांमार के ड्रग कार्टेल से पूर्वोत्तर भारत में नशीले पदार्थों की तस्करी की चुनौती बढ़ीBy IANS Mon, 02 November 2026 04:45 PM

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भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र नशीले पदार्थों की तस्करी करने वाले नेटवर्क और संगठित गिरोहों पर लगाम लगाने में जुटी सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। इस क्षेत्र में मादक पदार्थों के अवैध कारोबार को मुख्य रूप से पड़ोसी देश म्यांमार से होने वाली तस्करी से बढ़ावा मिल रहा है। सुरक्षा एजेंसियां मानती हैं कि वर्ष 2029 तक नशामुक्त भारत का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल जरूर है, लेकिन असंभव नहीं।

एक अधिकारी के अनुसार, पूर्वोत्तर में नशीले पदार्थों की समस्या से निपटने की रणनीति में बड़ा बदलाव किया गया है। अब केवल मादक पदार्थों की खेप जब्त करने से इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इसके बजाय एजेंसियों ने तस्करी के पूरे नेटवर्क को निशाना बनाने की रणनीति अपनाई है, जिसके तहत आपूर्ति श्रृंखला के साथ-साथ इसके स्रोतों, वित्तपोषकों और संचालकों पर कार्रवाई की जा रही है।

अधिकारी ने कहा, “अब तक हमारा ध्यान मुख्य रूप से जब्ती पर रहा है। लेकिन यह पर्याप्त साबित नहीं हुआ, क्योंकि कार्टेल लगातार नए मादक पदार्थों का उत्पादन करते रहे। इसलिए अब हमने पूरे नेटवर्क को निशाना बनाने का फैसला किया है, ताकि इसकी आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह बंद किया जा सके।”

पूर्वोत्तर के विभिन्न राज्यों में अभियान चला रहे अधिकारियों को कई स्तरों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पंजाब या जम्मू-कश्मीर की तुलना में यहां तस्करी के खिलाफ कार्रवाई अधिक जटिल है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां सबसे बड़ी बाधा हैं, जिसका फायदा कई बार तस्करी गिरोहों को मिलता है।

खुफिया ब्यूरो (आईबी) के एक अधिकारी ने कहा कि इस क्षेत्र में अभियान का व्यापक दायरा भी चुनौती बढ़ाता है।

म्यांमार अब अफगानिस्तान को पीछे छोड़कर दुनिया में अवैध अफीम उत्पादन करने वाला सबसे बड़ा देश बन गया है। म्यांमार के तस्करी गिरोह पहले से ही ब्राउन शुगर, तैयार हेरोइन और सिंथेटिक ड्रग मेथामफेटामाइन के उत्पादन और तस्करी के लिए कुख्यात रहे हैं। अब अफीम के भी इस कारोबार में शामिल होने से समस्या और जटिल हो गई है।

म्यांमार से कई तरह के नशीले पदार्थों की तस्करी होने के कारण सीमा पर निगरानी और कार्रवाई करना एजेंसियों के लिए मुश्किल साबित हो रहा है। भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा का बड़ा हिस्सा खुला है। यह सीमा मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के घने जंगलों तथा दुर्गम इलाकों से होकर गुजरती है।

नागा और मिजो जैसे स्थानीय समुदायों की ओर से सीमा पर बाड़ लगाने का विरोध भी इस प्रक्रिया को प्रभावित करता है। हालांकि, समस्या केवल भारत-म्यांमार सीमा तक सीमित नहीं है। बांग्लादेश सीमा के रास्ते भी असम, पश्चिम बंगाल, मिजोरम और त्रिपुरा में बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थ पहुंचाए जा रहे हैं।

एक अन्य अधिकारी ने कहा कि इतनी सारी चुनौतियों के बीच केवल जब्ती पर आधारित रणनीति कारगर नहीं हो सकती। इसलिए तस्करी नेटवर्क को निशाना बनाना जरूरी है।

अधिकारी के मुताबिक, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) भी इस अवैध कारोबार से जुड़े वित्तीय लेनदेन और धन के स्रोतों का पता लगाने में जुटा है। म्यांमार और बांग्लादेश से आने वाले धन के प्रवाह को रोकना भले ही मुश्किल हो, लेकिन भारत के भीतर चल रहे वित्तीय नेटवर्क पर कार्रवाई करना संभव है।

ईडी ने भारत में कारोबारियों से जुड़े ऐसे 1,400 म्यूल बैंक खातों का पता लगाया है, जिनका इस्तेमाल ड्रग सिंडिकेट को सामान खरीदने और उसके बदले नशीले पदार्थ हासिल करने में मदद के लिए किया जा रहा था।

ईडी की जांच में सामने आया कि म्यांमार में तैयार किए गए नशीले पदार्थों को जोखावथर के पास तियाउ नदी के रास्ते भारत लाया जाता है। नदी के दूसरी ओर म्यांमार का खावमावी क्षेत्र स्थित है। इसके बाद ये खेप मिजोरम के चम्फाई पहुंचती है और वहां से आइजोल, वैरेंगटे तथा असम होते हुए देश के अन्य हिस्सों तक भेजी जाती है। चम्फाई में अवैध मुद्रा विनिमय और हवाला नेटवर्क के जरिए लेनदेन किया जाता है।

चम्फाई पहुंचने वाला हवाला का पैसा दिल्ली, कोलकाता और मुंबई से आता है। पहली नजर में भारत के भीतर होने वाले ये लेनदेन सामान्य कारोबारी गतिविधियों जैसे दिखाई देते हैं। इन ड्रग कार्टेल के लिए काम करने वाले कारोबारियों को पेट्रोल, डीजल, दवाइयां, खाद्य तेल, आटा, कपड़े और जूते-चप्पल खरीदने की जिम्मेदारी दी जाती है।

इन वस्तुओं की खरीद पर जीएसटी बिल जारी होने के कारण लेनदेन वैध नजर आता है। लेकिन पूर्वोत्तर पहुंचने के बाद इन सामानों का नशीले पदार्थों के बदले आदान-प्रदान कर दिया जाता है। इस तरह तस्करी गिरोह वस्तु विनिमय यानी बार्टर प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे हैं।

भारत की सीमा के भीतर ही पैसों का लेनदेन होता है, जो सामान्य कारोबारी गतिविधियों जैसा दिखाई देता है। पूर्वोत्तर में सामान के बदले नशीले पदार्थ हासिल करने के बाद इन वस्तुओं को म्यांमार भेज दिया जाता है। इससे सीमा पार होने वाले लेनदेन का सीधा वित्तीय रिकॉर्ड नहीं बनता। ईडी की जांच के अनुसार, म्यांमार पहुंचने के बाद इन सामानों को व्यावसायिक रूप से बाजार में बेच दिया जाता है।

अधिकारियों का कहना है कि म्यांमार और पूर्वोत्तर राज्यों के बीच सक्रिय तस्करी गिरोह बेहद संगठित और जटिल नेटवर्क के जरिए काम करते हैं। उनके लिए एक-दो खेप जब्त होना बड़ी बाधा नहीं है, क्योंकि वे बड़े पैमाने पर नशीले पदार्थों का उत्पादन करने में सक्षम हैं।

म्यांमार में हर साल करीब 1,000 से 1,080 मीट्रिक टन अफीम का उत्पादन होता है। इसके अलावा, हर साल अरबों याबा टैबलेट भारत में पहुंचाई जा रही हैं। बड़ी मात्रा में क्रिस्टल मेथामफेटामाइन और केटामाइन की भी तस्करी की जा रही है।

अधिकारियों के अनुसार, यदि एजेंसियां केवल नशीले पदार्थों की खेप जब्त करने पर ध्यान देती रहीं, तो भारत में इनकी भारी आपूर्ति के कारण मौजूदा व्यवस्था पर दबाव बढ़ना तय है। ऐसे में तस्करी के पूरे नेटवर्क और समस्या की जड़ों को खत्म करने पर केंद्रित रणनीति ही लंबे समय में इस चुनौती से निपटने में मददगार हो सकती है।