उधार की राइफल से एशियन गेम्स तक पहुंची विदर्शा, एक वक्त शूटिंग छोड़ने का बना लिया था मनBy Admin Mon, 10 August 2026 05:03 PM

कभी उधार की राइफल से निशानेबाजी शुरू करने वाली केरल की 27 वर्षीय विदर्शा के. विनोद अब एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व करने की तैयारी कर रही हैं। कोझिकोड की रहने वाली विदर्शा अइची-नागोया एशियन गेम्स में 10 मीटर एयर राइफल और 50 मीटर राइफल 3 पोजिशंस स्पर्धाओं में हिस्सा लेंगी।

हालांकि, एशियन गेम्स तक का उनका सफर किसी आसान खेल कहानी जैसा नहीं रहा। आर्थिक तंगी, महंगे शूटिंग उपकरण, कोरोना महामारी के कारण रुका प्रशिक्षण, दिल्ली में अकेले रहकर संघर्ष और लगातार मिल रही निराशाओं के बीच एक समय ऐसा भी आया जब विदर्शा ने शूटिंग छोड़ने का लगभग फैसला कर लिया था।

शूटिंग से हुआ पहला परिचय

विदर्शा ने 2018 में नेशनल कैडेट कोर (NCC) के जरिए निशानेबाजी शुरू की थी। उस समय उनके मन में इसे करियर बनाने का कोई इरादा नहीं था। वह सिर्फ इस खेल का अनुभव लेना चाहती थीं।

लेकिन उधार के उपकरण से अभ्यास करने के बावजूद केरल स्टेट चैंपियनशिप में ओवरऑल चैंपियन बनने के बाद उनका नजरिया बदल गया।

विदर्शा ने कहा, “मैं सिर्फ शूटिंग का अनुभव लेना चाहती थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि यह मेरा पेशा बन जाएगा। जब उधार के उपकरण से अभ्यास करने के बावजूद मैं केरल स्टेट चैंपियनशिप में ओवरऑल चैंपियन बनी, तब मुझे एहसास हुआ कि मुझे इसी खेल को आगे बढ़ाना है।”

महंगे खेल ने परिवार के सामने रखी बड़ी चुनौती

निशानेबाजी में प्रतिभा दिखाना एक बात थी, लेकिन इसे करियर में बदलने के लिए लगातार पैसे की जरूरत थी। राइफल, गोला-बारूद और देशभर में होने वाली प्रतियोगिताओं में आने-जाने का खर्च एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए आसान नहीं था।

कई बार विदर्शा के माता-पिता प्रतियोगिताओं में उनके साथ यात्रा तक नहीं कर पाते थे। आर्थिक बोझ कम करने के लिए उन्होंने अकेले सफर करना शुरू कर दिया। आखिरकार 2021 में उनके परिवार ने कर्ज लेकर उनकी पहली राइफल खरीदी।

विदर्शा के लिए यह सिर्फ एक राइफल नहीं थी, बल्कि उनके परिवार के भरोसे और उनके सपने में किया गया बड़ा निवेश था।

कोरोना ने रोकी ट्रेनिंग, लेकिन हौसला नहीं

कोविड-19 महामारी ने उनके सफर को एक और झटका दिया। जिस राइफल से वह अभ्यास करती थीं, वह उनकी एसोसिएशन की थी। लॉकडाउन के दौरान उनके पास प्रशिक्षण के लिए जरूरी उपकरण ही नहीं रहा।

इसके बावजूद उन्होंने खुद को खेल से पूरी तरह दूर नहीं होने दिया। शूटिंग नहीं कर पाने के दौरान उन्होंने फिटनेस, योग और मेडिटेशन पर ध्यान दिया।

उन्होंने कहा, “मैं शूटिंग नहीं कर सकती थी, लेकिन मैंने ट्रेनिंग कभी नहीं छोड़ी। मैं फिटनेस, योग और मेडिटेशन पर ध्यान देती रही, क्योंकि मुझे पता था कि मौका मिलते ही मुझे तैयार रहना होगा।”

पति ने दिलाया अपने सपने पर भरोसा

महामारी के बाद उनकी जिंदगी में एक और अहम मोड़ आया। उनकी मुलाकात साथी राइफल शूटर मनु एस. रवि से हुई। दोनों की दोस्ती बाद में शादी में बदल गई। मनु अब केरल में शूटिंग कोच के रूप में काम करते हैं और विदर्शा के करियर में लगातार उनका साथ देते हैं।

एक बातचीत ने विदर्शा को अपने सपने की जिम्मेदारी खुद लेने का हौसला दिया। मनु ने उनसे पूछा कि वह अपनी राइफल क्यों नहीं खरीद लेतीं।

विदर्शा ने बताया, “शुरुआत में मैं हंस पड़ी, क्योंकि उस समय हमारे लिए राइफल खरीदना आर्थिक रूप से संभव नहीं था। लेकिन उन्होंने मुझे समझाया कि अगर मैं अपने सपने पर सच में विश्वास करती हूं तो मुझे यह कदम उठाना होगा। उस बातचीत ने मुझे अपने माता-पिता से बात करने का साहस दिया और हमने मिलकर मेरे भविष्य में निवेश करने का फैसला किया।”

पहला राष्ट्रीय पदक और फिर दिल्ली का सफर

कोच मनोज कुमार के मार्गदर्शन और पति मनु के सहयोग से विदर्शा ने प्रतियोगिताओं में लगातार बेहतर प्रदर्शन करना शुरू किया। 2022 में उन्होंने अपना पहला राष्ट्रीय पदक जीता। यह पदक उनके परिवार के त्याग और मेहनत के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी।

बेहतर और प्रतिस्पर्धी प्रशिक्षण माहौल की तलाश में वह बाद में नई दिल्ली आ गईं और डॉ. कर्णी सिंह शूटिंग रेंज में अभ्यास शुरू किया।

दिल्ली में घर से दूर अकेले रहना उनके लिए आसान नहीं था। खाना बनाने से लेकर रोजमर्रा के काम खुद संभालने और उसके साथ लगातार उच्च स्तर की ट्रेनिंग जारी रखने की चुनौती थी। भाषा भी उनके लिए एक बाधा थी, क्योंकि वह हिंदी से परिचित नहीं थीं।

उन्होंने कहा, “दिल्ली में अकेले रहना आसान नहीं था। मुझे अपना खाना बनाना पड़ता था, हर चीज खुद संभालनी पड़ती थी और रोज ट्रेनिंग भी करनी होती थी। कई बार शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत थकान होती थी, लेकिन मुझे पता था कि भारत का प्रतिनिधित्व करना है तो ये त्याग जरूरी हैं।”

2024 में टूटने की कगार पर पहुंची थीं

लगातार आर्थिक मुश्किलों और कुछ करीबी मुकाबलों में सफलता से चूकने के कारण 2024 की शुरुआत में विदर्शा मानसिक रूप से काफी दबाव में आ गई थीं। वह शूटिंग छोड़ने तक के बारे में सोचने लगी थीं।

उन्होंने कहा, “मैंने लगभग शूटिंग छोड़ने का फैसला कर लिया था। मेरे परिवार, पति और कोच ने मेरे लिए बहुत कुछ त्याग किया था और मुझे इसका अपराधबोध होने लगा था। लेकिन जब मैं खुद पर भरोसा खो रही थी, तब भी उन्होंने मुझ पर विश्वास करना नहीं छोड़ा।”

SAI NCOE ने बदल दी कहानी

इसके बाद विदर्शा के करियर में सबसे बड़ा बदलाव आया। उन्हें भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (NCOE) में जगह मिली।

यहां उन्हें बेहतर प्रशिक्षण के साथ रहने की सुविधा, पोषण और गोला-बारूद जैसी जरूरी सुविधाएं मिलने लगीं। इससे उन आर्थिक और व्यावहारिक परेशानियों में काफी कमी आई, जो लंबे समय से उनकी तैयारी को प्रभावित कर रही थीं।

विदर्शा ने कहा, “SAI NCOE में जगह मिलना मेरे लिए सब कुछ बदल देने वाला था। इससे मेरी कई परेशानियां दूर हो गईं और मुझे हर दिन सिर्फ एक बेहतर शूटर बनने पर ध्यान देने का मौका मिला।”

इसके बाद नतीजे भी तेजी से सामने आने लगे। 2025 एशियन शूटिंग चैंपियनशिप में विदर्शा ने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय पदक जीता और इसके बाद पहली बार एशियन गेम्स के लिए भारतीय टीम में जगह बनाई।

दूसरों से नहीं, खुद से मुकाबला

एशियन गेम्स जैसे बड़े मंच पर पहुंचने के बावजूद विदर्शा अपना ध्यान दूसरे खिलाड़ियों से तुलना करने के बजाय खुद को बेहतर बनाने पर रख रही हैं।

उन्होंने कहा, “मैं दूसरे निशानेबाजों से मुकाबला नहीं करती। मेरा मुकाबला खुद से है। मेरा ध्यान अपनी प्रक्रिया पर रहता है और मैं खुद का बेहतर संस्करण बनने की कोशिश करती हूं। अगर मैं लगातार ऐसा करती रही तो नतीजे अपने आप आएंगे।”

NRAI के सिस्टम की भी की तारीफ

विदर्शा ने नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) के प्रदर्शन आधारित सिस्टम की भी सराहना की। उनका कहना है कि लगातार अच्छा प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं।

उन्होंने कहा कि हाई परफॉर्मेंस टीम, कोच और सपोर्ट स्टाफ ने उन्हें बेहतर बनने में लगातार मदद की है। उन्होंने NRAI अध्यक्ष कालिकेश नारायण सिंह देव की भी खिलाड़ियों की समस्याएं सुनने और सुझावों के लिए उपलब्ध रहने को लेकर सराहना की।

भाई भी बने निशानेबाज

विदर्शा की सफलता का असर अब उनके छोटे भाई पर भी पड़ा है। सिविल सर्विसेज और MBA की तैयारी कर रहे उनके भाई ने भी शूटिंग को अपना लिया है और अब पिस्टल शूटिंग में प्रशिक्षण ले रहे हैं।

अब लक्ष्य सिर्फ एशियन गेम्स नहीं

एशियन गेम्स में पदार्पण को लेकर उत्साहित विदर्शा इसे भी दूसरी प्रतियोगिताओं की तरह ही ले रही हैं। उनका मानना है कि चैंपियन बनने की असली तैयारी अभ्यास के दौरान होती है।

उन्होंने कहा, “चाहे एशियन गेम्स हो, वर्ल्ड कप हो या राष्ट्रीय प्रतियोगिता, मेरा नजरिया नहीं बदलता। चैंपियन अभ्यास में बनते हैं। अगर मैं हर दिन ट्रेनिंग में अपना सर्वश्रेष्ठ देती हूं, तो प्रतियोगिता में भी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर पाऊंगी।”

उधार की राइफल से शुरू हुआ सफर अब एशियन गेम्स तक पहुंच चुका है, लेकिन विदर्शा की नजर इससे भी आगे है। उनका सबसे बड़ा सपना विश्व की नंबर-1 निशानेबाज बनना है।

उन्होंने कहा, “मेरा सबसे बड़ा सपना वर्ल्ड नंबर-1 बनना है। मैं अपनी पूरी क्षमता को पहचानना चाहती हूं और जब भी शूटिंग रेंज पर उतरूं, खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करना चाहती हूं।”

एक समय शूटिंग छोड़ने का विचार कर चुकी विदर्शा के लिए एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व करना सिर्फ एक खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि परिवार के त्याग, आर्थिक संघर्ष और खुद पर दोबारा विश्वास करने की कहानी का अगला अध्याय है।

 

With inputs from IANS