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भारतीय भारोत्तोलक मीराबाई चानू ने आखिरकार वह मुकाम हासिल कर लिया जिसका उन्हें वर्षों से इंतजार था। बुधवार को उन्होंने एशियाई खेलों की महिलाओं की 49 किग्रा भारवर्ग स्पर्धा में रजत पदक जीतकर अपने करियर का वह अधूरा अध्याय पूरा कर दिया, जो लंबे समय से उनका सपना बना हुआ था।
पोडियम पर पहुंचने के बाद भावुक मीराबाई ने कहा, “आखिरकार मैंने पदक जीत लिया। मैं बहुत खुश हूं कि मेरे पास रजत पदक है। मैं कई वर्षों से इसका इंतजार कर रही थी। जब से मैंने भारोत्तोलन शुरू किया था, तभी से यह मेरा सपना था। आज मेरा सपना पूरा हो गया।”
32 वर्षीय मीराबाई ने कुल 198 किग्रा वजन उठाया। उन्होंने स्नैच में 87 किग्रा और क्लीन एंड जर्क में 111 किग्रा का भार उठाकर दूसरा स्थान हासिल किया। उत्तर कोरिया की री सोंग-गुम ने 210 किग्रा के कुल भार के साथ स्वर्ण पदक जीता, जबकि इंडोनेशिया की विजायाना लुलुक डियानी त्रि ने 191 किग्रा के साथ कांस्य पदक अपने नाम किया।
यह पदक मीराबाई के लिए सिर्फ एक और उपलब्धि नहीं, बल्कि वर्षों की निराशा, चोट और अधूरे प्रयासों का जवाब भी है। वह 2018 के एशियाई खेलों में चोट के कारण हिस्सा नहीं ले सकी थीं। इसके बाद 2023 के हांगझोउ एशियाई खेलों में भी वह पदक के बेहद करीब पहुंचकर चौथे स्थान पर रही थीं। जांघ की चोट ने उस प्रतियोगिता में उनके क्लीन एंड जर्क प्रयासों को प्रभावित किया था।
इस बार जब उनका नाम पदक विजेताओं में आया तो पुरानी यादें भी ताजा हो गईं। मीराबाई ने बताया कि उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे।
उन्होंने कहा, “ग्लासगो में भी मैं बहुत भावुक हुई थी। उस समय खुशी के आंसू थे। आज भी मुझे लगा कि मैं रो पड़ूंगी। खुशी के कारण मेरी आंखों में आंसू आ गए थे, लेकिन मैं रोई नहीं। मैं बहुत खुश थी क्योंकि मुझे वह मिल गया जिसकी मैं चाहती थी।”
मीराबाई का यह रजत भारतीय भारोत्तोलन के लिए भी खास महत्व रखता है। वह 1998 के बैंकॉक एशियाई खेलों में कर्णम मल्लेश्वरी के रजत पदक के बाद एशियाई खेलों में पदक जीतने वाली भारत की पहली भारोत्तोलक बनी हैं। इस तरह इस खेल में भारत का 28 साल का पदक इंतजार भी खत्म हुआ।
मीराबाई पहले ही ओलंपिक रजत, विश्व चैंपियनशिप का खिताब और राष्ट्रमंडल खेलों में कई स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। अब एशियाई खेलों का रजत भी उनके शानदार अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड में जुड़ गया है।
पदक जीतने के बाद मीराबाई ने सरकार से एक सम्मान दिए जाने की इच्छा भी जाहिर की। उन्होंने कहा कि उन्हें अब तक अर्जुन पुरस्कार नहीं मिला है और वह चाहती हैं कि उनकी उपलब्धियों को देखते हुए सरकार इस सम्मान के लिए उनके नाम पर विचार करे।
उन्होंने कहा, “मैं सरकार से अनुरोध करना चाहूंगी कि मुझे अर्जुन पुरस्कार दिया जाए। इससे मुझे बहुत खुशी होगी। अर्जुन पुरस्कार मेरे लिए बहुत बड़ा सम्मान है। मेरे पास यह पुरस्कार नहीं है और मैं इसे पाना चाहती हूं।”
मीराबाई के लिए नागोया का यह पदक वर्षों की मेहनत और इंतजार के बाद मिला वह क्षण है, जिसे वह लंबे समय तक याद रखेंगी। चोटों और निराशाओं के बावजूद उन्होंने एशियाई खेलों के पदक का सपना नहीं छोड़ा और आखिरकार उसे हकीकत में बदल दिया।