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एशियाई पैरा खेलों में भारत ने पैरा एथलेटिक्स में एक और यादगार प्रदर्शन किया। पुरुषों की 100 मीटर T47 स्पर्धा में दिलीप गावित महादु ने स्वर्ण पदक जीता, जबकि मोहम्मद बेसिल मोर्सिनगनकाथी ने रजत अपने नाम किया।
दिलीप गावित ने 10.69 सेकंड के शानदार समय के साथ स्वर्ण पदक जीता। भारत की सफलता में बेसिल ने 10.72 सेकंड के समय के साथ रजत पदक हासिल किया, और इस दौरान उन्होंने इस स्पर्धा का नया गेम्स रिकॉर्ड भी बनाया।
दोनों ने राष्ट्रमंडल खेल 2026 के अपने 1-2 प्रदर्शन को दोहराया, जहां दिलीप गावित ने पुरुषों की 100 मीटर T47 में गेम्स रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण जीता था और बेसिल ने रजत पदक के साथ भारत का दबदबा पूरा किया था।
दिलीप गावित ने इससे पहले 2022 एशियाई पैरा खेलों में पुरुषों की 400 मीटर T47 स्पर्धा में स्वर्ण जीता था, जो खेलों में भारत का ऐतिहासिक 100वां पदक था। उन्होंने पेरिस 2024 पैरालंपिक्स में पुरुषों की 400 मीटर T47 स्पर्धा के फाइनल में पहुंचकर देश को और गर्व भी दिलाया था।
महाराष्ट्र के नासिक के पास तोरण डोंगरी नाम के छोटे से गांव में जन्मे दिलीप गावित एक साधारण किसान परिवार में पले-बढ़े। उनकी जिंदगी तब बड़ी मोड़ पर आई जब पांच-छह साल की उम्र में वे पेड़ से गिर गए, जिससे उनकी दाहिनी बांह गंभीर रूप से घायल हो गई।
समय पर इलाज न मिलने के कारण घाव गैंग्रीन में बदल गया, जिसके चलते उनकी बांह कोहनी के नीचे से काटनी पड़ी। इस बड़े झटके के बावजूद गावित ने अपनी विकलांगता को अपना भविष्य तय करने नहीं दिया और दौड़ने के अपने जुनून को पैरा एथलेटिक्स में करियर के रूप में बदल दिया।
अपने गांव की धूल भरी सड़कों पर अभ्यास करने वाले गावित की प्रतिभा को बाद में कोच वैज्ञानिक काले ने पहचाना, जिन्होंने उन्हें पेशेवर पैरा एथलेटिक्स में मार्ग दिखाया।
पैरा एथलेटिक्स में T46 और T47 वर्गीकरण उन खड़े एथलीटों पर लागू होते हैं जिनके ऊपरी अंगों में विकलांगता है, जैसे अंग की कमी या विच्छेदन। T46 में एक हाथ का कोहनी के ऊपर या नीचे से विच्छेदन या इसी तरह की गंभीर विकलांगता शामिल है, जबकि T47 में ऊपरी अंग की अपेक्षाकृत हल्की विकलांगता होती है, जिसमें कलाई और बांह के कार्य की अधिक क्षमता होती है और यह मुख्य रूप से स्प्रिंट और जंप स्पर्धाओं को प्रभावित करता है।
दिलीप गावित की कहानी एक ऐसे एथलीट की है जिसने बचपन में हुई एक दुर्घटना से मिली स्थायी चोट को अपनी सबसे बड़ी ताकत में बदल दिया। गांव की सड़कों से एशियाई खेलों के स्वर्ण तक का उनका सफर सिर्फ एक पदक की कहानी नहीं, बल्कि उस जिद की कहानी है जो किसी भी अभाव से बड़ी होती है।