कूटनीतिक प्रभाव बढ़ाने के लिए भारत को तकनीक के क्षेत्र में बड़ी छलांग लगाने की जरूरतBy Admin Thu, 12 February 2026 03:06 PM

नई दिल्ली। एक लेख के अनुसार भारत को दुर्लभ खनिज प्रसंस्करण, उन्नत जैविक दवाओं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और किफायती सैटेलाइट लॉन्च सेवाओं जैसी नई तकनीकों के विकास के लिए अमेरिकी मॉडल को अपनाना चाहिए। इससे भारत ऐसी रणनीतिक निर्भरता पैदा कर सकेगा, जिसका कूटनीतिक स्तर पर लाभ उठाया जा सके।

‘इंडिया नैरेटिव’ में प्रकाशित लेख में कहा गया है कि रक्षा और सूचना प्रौद्योगिकी में उन्नत तकनीक पर अमेरिका का नियंत्रण और उसकी मजबूत वित्तीय प्रणाली राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अन्य देशों के साथ कूटनीतिक संबंधों में प्रभावशाली स्थिति प्रदान करती है।

लेखक श्रीजीत फडके ने लिखा, “अमेरिका की प्रगति यह सिखाती है कि प्रभुत्व योजनाबद्ध और अनिवार्य तकनीकी बढ़त से आता है। भारत को इसे नैतिक मूल्यों से समझौता किए बिना अपनाना होगा—निरंतर नवाचार करना होगा, साझा लक्ष्यों के लिए मजबूत समन्वय स्थापित करना होगा और रणनीतिक निर्भरता पैदा करनी होगी।”

लेख में कहा गया है कि भारत को ऐसे क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए, जहां वह वैश्विक स्तर पर मजबूत पकड़ बना सके। इनमें दुर्लभ खनिज प्रसंस्करण, जेनेरिक दवाएं और उन्नत जैविक उत्पाद, उभरते बाजारों के लिए ओपन-सोर्स एआई फ्रेमवर्क, किफायती सैटेलाइट और लॉन्च सेवाएं तथा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे यूपीआई का वैश्विक विस्तार) शामिल हैं। इन क्षेत्रों में भारत की क्षमता पर दुनिया को निर्भर बनाकर कूटनीतिक लाभ उठाया जा सकता है।

लेख में यह भी कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में प्रभाव केवल सद्भावना से नहीं मिलता। डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति और व्यापारिक टकराव यह दर्शाते हैं कि शक्तिशाली देश आर्थिक प्रतिबंध, तकनीकी मानक, वित्तीय प्रणालियां, सांस्कृतिक प्रभाव और लोकतांत्रिक मूल्यों तक का इस्तेमाल अपने हितों को सुरक्षित करने के लिए करते हैं।

लेख के अनुसार वास्तविक सौदेबाजी की ताकत तभी आती है, जब किसी देश के पास ऐसे विशिष्ट और अपरिहार्य लाभ हों, जिनका कोई विकल्प न हो। अमेरिका ने लगातार नवाचार के जरिए पूरे क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित किया है और उन्हें वैश्विक व्यवस्था में इस तरह शामिल किया है कि उनके विकल्प ढूंढना मुश्किल या अत्यधिक महंगा हो जाता है।

हालांकि लेख में यह भी कहा गया है कि भारत को अमेरिका की रणनीति की अंधी नकल नहीं करनी चाहिए, बल्कि मूल सिद्धांत अपनाना चाहिए—भारत पर निर्भरता पैदा करना। चुनिंदा क्षेत्रों, तकनीकों और सेवाओं को अनिवार्य बनाकर ही भारत वैश्विक ताकतों में अपनी मजबूत स्थिति बना सकता है।

लेख में सुझाव दिया गया है कि भारत को उच्च मूल्य वाली सेवा निर्यात—जैसे आईटी, सॉफ्टवेयर, एआई, फिनटेक और बायोटेक—का तेजी से विस्तार करना चाहिए, साथ ही इलेक्ट्रॉनिक्स, नवीकरणीय ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में विनिर्माण को भी मजबूत बनाए रखना चाहिए। एआई प्रतिभा और किफायती विकास में भारत की मौजूदा बढ़त को बड़े पैमाने पर सार्वजनिक और निजी निवेश के जरिए और मजबूत करने की जरूरत है। साथ ही एआई एजेंट्स, क्वांटम-प्रतिरोधी क्रिप्टोग्राफी और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे उभरते क्षेत्रों में वैश्विक बाजार हिस्सेदारी हासिल करने का लक्ष्य रखा जाना चाहिए।

लेख में देश की शिक्षा और अनुसंधान व्यवस्था में बड़े बदलाव की भी जरूरत बताई गई है। इसमें पाठ्यक्रमों में सुधार कर रटने की बजाय मौलिक और गहन शोध को प्राथमिकता देने, बहुविषयक अध्ययन को बढ़ावा देने और पारंपरिक सोच को चुनौती देने पर जोर दिया गया है। साथ ही नीरस और सीमित शोध कार्य को हतोत्साहित कर ऐसे नवाचार को बढ़ावा देने की बात कही गई है, जो व्यापक निर्भरता और अपरिहार्य मूल्य पैदा कर सके।

 

With inputs from IANS