
हैदराबाद: भारत के टाइगर रिजर्व में बढ़ता पर्यटन और मानव गतिविधियां बाघों में तनाव बढ़ा रही हैं, जिसका असर उनके प्रजनन पर भी पड़ रहा है। यह खुलासा CSIR-सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB) के एक नए अध्ययन में हुआ है।
यह अध्ययन जूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन की पत्रिका एनिमल कंजर्वेशन में प्रकाशित हुआ है। इसमें पहली बार भारत के पांच प्रमुख टाइगर रिजर्व — Corbett Tiger Reserve, Tadoba-Andhari Tiger Reserve, Kanha Tiger Reserve, Bandhavgarh Tiger Reserve और Periyar Tiger Reserve में बाघों के तनाव और प्रजनन हार्मोन का गैर-आक्रामक तरीके से विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में बताया गया कि पर्यटन सड़कों और अधिक मानव गतिविधियों वाले क्षेत्रों के पास रहने वाले बाघों में तनाव हार्मोन का स्तर लगातार अधिक पाया गया। वैज्ञानिकों ने 2020 से 2023 के बीच एकत्र किए गए 610 बाघों के मल नमूनों का विश्लेषण किया, जिनमें 291 मादा और 185 नर बाघ शामिल थे।
शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने बाघों के तनाव को मापने के लिए ग्लूकोकॉर्टिकोइड मेटाबोलाइट्स और मादा बाघों की प्रजनन गतिविधि को समझने के लिए प्रोजेस्टेरोन मेटाबोलाइट्स का अध्ययन किया।
अध्ययन की सबसे अहम बात यह रही कि संरक्षित कोर क्षेत्रों में रहने वाले बाघ मानव हस्तक्षेप के प्रति अधिक तनावग्रस्त पाए गए, जबकि बफर जोन के बाघों में यह प्रभाव अपेक्षाकृत कम दिखा। वैज्ञानिकों का मानना है कि बफर जोन के बाघ सालभर मानव गतिविधियों के आदी हो चुके हैं, जबकि कोर क्षेत्रों में मौसमी पर्यटन के प्रवेश से अचानक तनाव बढ़ जाता है। इसका सबसे अधिक असर ताडोबा और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में देखा गया।
CSIR-CCMB के मुख्य वैज्ञानिक Dr G. Umapathy ने कहा, “बाघिनें जंगल के शांत इलाकों में प्रजनन करना पसंद करती हैं, लेकिन अब ऐसे सुरक्षित स्थान कम होते जा रहे हैं। यदि कोर क्षेत्र भी तनावपूर्ण हो गए, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। तनाव की स्थिति में न केवल प्रजनन प्रभावित होता है, बल्कि शावकों का विकास भी अलग तरीके से होता है।”
वहीं, CSIR-Centre for Cellular and Molecular Biology के निदेशक Dr Vinay Nandicoori ने कहा कि यह अध्ययन दिखाता है कि आणविक जीवविज्ञान और फिजियोलॉजी का उपयोग भारत की वन्यजीव संरक्षण प्राथमिकताओं में कितनी प्रभावी भूमिका निभा सकता है।
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि टाइगर रिजर्व में पर्यटक वाहनों की संख्या नियंत्रित की जाए, सफारी का समय कम किया जाए, बाघों के प्रजनन क्षेत्रों की विशेष सुरक्षा हो और गैर-पर्यटन मार्गों पर अतिरिक्त जलस्रोत विकसित किए जाएं। साथ ही, बाघिनों की लगातार गैर-आक्रामक निगरानी कर प्रजनन क्षेत्रों की पहचान और सुरक्षा सुनिश्चित करने की सिफारिश की गई है।
वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया कि वे वन्यजीव पर्यटन के खिलाफ नहीं हैं, क्योंकि इससे संरक्षण कार्यों और ग्रामीण आजीविका को मदद मिलती है। हालांकि, उन्होंने कहा कि पर्यटन प्रबंधन को वैज्ञानिक आधार पर संतुलित करना जरूरी है, ताकि बाघों के प्राकृतिक व्यवहार और प्रजनन पर नकारात्मक असर न पड़े।
With inputs from IANS