AI का बढ़ता असर: 2030 तक दोगुनी हो सकती है बिजली खपत, जल संकट भी गहरा सकता है – संयुक्त राष्ट्र की चेतावनीBy Admin Sat, 06 June 2026 10:47 AM

नई दिल्ली। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को भविष्य की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति माना जा रहा है, लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर संयुक्त राष्ट्र (UN) ने गंभीर चेतावनी जारी की है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक AI की बिजली खपत दोगुनी होकर वैश्विक विद्युत उपयोग का लगभग 3 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसके साथ ही AI से होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ब्रिटेन जैसे देश के कुल उत्सर्जन के बराबर हो सकता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि AI आधारित डेटा सेंटरों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होगी। अनुमान है कि भविष्य में इनकी जल खपत दुनिया की पूरी आबादी की वार्षिक पेयजल आवश्यकता के बराबर या उससे अधिक हो सकती है।

क्या है 'जेवन्स पैराडॉक्स'?

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में "जेवन्स पैराडॉक्स" का उल्लेख किया गया है। यह सिद्धांत बताता है कि जब किसी संसाधन के उपयोग की तकनीक अधिक कुशल हो जाती है, तो उस संसाधन की कुल खपत घटने के बजाय बढ़ सकती है।

19वीं शताब्दी में अर्थशास्त्री William Stanley Jevons ने इंग्लैंड में कोयले के उपयोग का अध्ययन करते हुए पाया था कि दक्षता बढ़ने से लागत कम हुई, लेकिन परिणामस्वरूप कोयले की मांग और खपत दोनों बढ़ गईं।

रिपोर्ट के अनुसार, AI तकनीक जैसे-जैसे सस्ती और अधिक सुलभ होगी, इसके नए उपयोग बढ़ेंगे और कुल संसाधन खपत में भी वृद्धि होगी। ऐसे में दक्षता से मिलने वाले लाभ सीमित हो सकते हैं।

डेटा सेंटरों की बढ़ती मांग

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले वर्ष दुनिया के डेटा सेंटरों ने उतनी ही बिजली खर्च की जितनी पूरी Saudi Arabia ने उपयोग की। यदि 2030 तक इनकी बिजली खपत दोगुनी हो जाती है, तो उससे उत्पन्न कार्बन उत्सर्जन की भरपाई के लिए लगभग 6.7 अरब पेड़ों को दस वर्षों तक उगाना पड़ेगा।

इसके अलावा, अनुमान है कि AI और डेटा सेंटरों के विस्तार के लिए:

  • लगभग 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी की आवश्यकता होगी।
  • मेक्सिको सिटी के क्षेत्रफल से लगभग दस गुना अधिक भूमि की जरूरत पड़ सकती है।

बढ़ सकती है डिजिटल और पर्यावरणीय असमानता

रिपोर्ट में यह भी चिंता जताई गई है कि AI अवसंरचना कुछ चुनिंदा देशों तक सीमित होती जा रही है। वर्तमान में केवल 32 देशों में AI-विशिष्ट क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है, जबकि इसकी लगभग 90 प्रतिशत क्षमता United States और China में केंद्रित है।

इस स्थिति में AI सेवाओं का उपयोग करने वाले अन्य देशों को खनिज उत्खनन, इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-वेस्ट) और पर्यावरणीय नुकसान का बड़ा बोझ उठाना पड़ सकता है।

संयुक्त राष्ट्र की सिफारिशें

रिपोर्ट में AI के जिम्मेदार और टिकाऊ उपयोग के लिए कई सुझाव दिए गए हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना
  • ऊर्जा दक्षता को डिजाइन का हिस्सा बनाना
  • संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग को सुनिश्चित करना
  • पूरे जीवनचक्र की जिम्मेदारी तय करना
  • वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देना
  • खनिजों की आपूर्ति से लेकर रीसाइक्लिंग और सुरक्षित निपटान तक निगरानी रखना

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि AI का भविष्य केवल तकनीकी प्रगति पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि दुनिया इसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का प्रबंधन कितनी जिम्मेदारी से करती है।

 

WIth inputs from IANS