




नई दिल्ली। देशभर में मानसून की सक्रियता बढ़ने और तापमान में गिरावट आने के साथ भारत में बिजली की अधिकतम मांग में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। ग्रिड कंट्रोलर ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, बिजली की पीक डिमांड घटकर 241 गीगावाट (GW) रह गई है, जबकि मई में यह 270.8 गीगावाट के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थी।
बारिश के कारण कई राज्यों में गर्मी से राहत मिली है, जिससे एयर कंडीशनर, कूलर और अन्य शीतलन उपकरणों का उपयोग कम हुआ और बिजली की मांग में नरमी आई।
16 जून को सौर ऊर्जा उपलब्ध रहने के समय बिजली की अधिकतम मांग 249.7 गीगावाट दर्ज की गई, जबकि गैर-सौर घंटों में यह 247.5 गीगावाट रही।

देश के कुल बिजली उत्पादन में कोयला आधारित संयंत्रों की हिस्सेदारी सबसे अधिक 68 प्रतिशत रही। वहीं, सौर ऊर्जा ने 19 प्रतिशत और जलविद्युत परियोजनाओं ने 7 प्रतिशत योगदान दिया।
बिजली की मांग में कमी का असर ऊर्जा बाजार पर भी दिखाई दिया है। इंडियन एनर्जी एक्सचेंज (IEX) में जून के मध्य के दौरान बिजली का औसत स्पॉट प्राइस 3.6 रुपये प्रति यूनिट (किलोवाट-घंटा) रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 18 प्रतिशत कम है।
रियल-टाइम मार्केट में भी कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। 16 जून को बिजली की कीमत 4.5 रुपये प्रति यूनिट रही, जबकि 21 मई को रिकॉर्ड मांग के दौरान यह 6.5 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच गई थी।
हालांकि मांग में मौजूदा गिरावट आई है, फिर भी 16 जून 2026 को दर्ज 241 गीगावाट की पीक डिमांड पिछले वर्ष इसी दिन की 217 गीगावाट मांग से अधिक रही।


भारत में आमतौर पर मई और जून के महीनों में भीषण गर्मी के कारण बिजली की मांग चरम पर पहुंचती है। मानसून के आगमन के बाद तापमान में कमी आने से खपत घटती है, जबकि कई क्षेत्रों में जलविद्युत उत्पादन बढ़ने से बिजली आपूर्ति को भी मजबूती मिलती है।
एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती बिजली खपत, इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और डेटा सेंटर जैसे नए क्षेत्रों की मांग के चलते भारत के बिजली क्षेत्र में 65 से 70 लाख करोड़ रुपये तक के पूंजी निवेश (कैपेक्स) की संभावनाएं बन रही हैं। मजबूत सरकारी नीतियों और लगातार बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के कारण इस क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक विकास की संभावनाएं सकारात्मक बनी हुई हैं।
With inputs from IANS
