भारत-आर्मेनिया की नई अंतरिक्ष साझेदारी, हाई-एल्टीट्यूड बैलून और नियर-स्पेस तकनीक को मिलेगा बढ़ावाBy Admin Sat, 20 June 2026 10:23 AM







नई दिल्ली। भारत की नियर-स्पेस टेक्नोलॉजी कंपनी रेड बैलून एयरोस्पेस और आर्मेनिया की बजूम्क स्पेस रिसर्च लेबोरेटरी ने उच्च ऊंचाई वाले बैलून, नियर-स्पेस परीक्षण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित पेलोड सिस्टम के विकास के लिए साझेदारी की है। इस सहयोग का उद्देश्य समताप मंडल (स्ट्रैटोस्फियर) में अनुसंधान और व्यावसायिक उपयोग की संभावनाओं को नई गति देना है।

रिपोर्ट के अनुसार, दोनों संस्थाओं के बीच हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) के तहत उच्च ऊंचाई वाले बैलून प्लेटफॉर्म पर संयुक्त परीक्षण अभियान चलाए जाएंगे। इन अभियानों के दौरान विभिन्न प्रयोगात्मक उपकरणों और ऑनबोर्ड कंप्यूटिंग सिस्टम को नियर-स्पेस जैसी परिस्थितियों में परखा जाएगा, जो सामान्य विमानन ऊंचाई से काफी ऊपर लेकिन पृथ्वी की कक्षा से नीचे होती हैं।

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इस साझेदारी का एक प्रमुख लक्ष्य एआई-सक्षम ऑनबोर्ड सिस्टम विकसित करना है, जो वास्तविक समय में डेटा का विश्लेषण कर सकें, पेलोड संचालन को नियंत्रित करें और सीमित ग्राउंड सपोर्ट के साथ अर्ध-स्वायत्त मिशनों को संचालित करने में सक्षम हों।

इसके अलावा दोनों पक्ष स्थिरता एवं लक्ष्य निर्धारण (पॉइंटिंग) प्रणालियों, संचार रिले तकनीक, सेंसर आधारित पेलोड और उन्नत डेटा प्रोसेसिंग तकनीकों पर भी मिलकर काम करेंगे।

यह समझौता रेड बैलून एयरोस्पेस के हालिया ‘मिशन साना’ के बाद हुआ है, जिसे 27 मई 2026 को सफलतापूर्वक संचालित किया गया था। इस मिशन के दौरान कंपनी ने ‘विस्टा’ नामक भारत का पहला स्वदेशी स्ट्रैटोस्फेरिक सुपर-प्रेशर बैलून प्लेटफॉर्म लॉन्च किया था, जो व्यावसायिक पेलोड ले जाने में सक्षम है।

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वहीं, आर्मेनिया की बजूम्क स्पेस रिसर्च लेबोरेटरी पहले भी एयास एयरोस्पेस सोसाइटी के साथ मिलकर स्ट्रैटोस्फेरिक परियोजनाओं पर काम कर चुकी है। संस्था नियर-स्पेस तकनीकों को धरती आधारित अवसंरचना, विमानन सेवाओं और उपग्रह प्रणालियों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी मानती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह सहयोग केवल अनुसंधान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी योजनाओं, अनुदान आधारित परियोजनाओं और ग्राहकों की जरूरतों के अनुरूप प्रोटोटाइप विकसित करने के अवसरों की भी तलाश करेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि हाई-एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म सिस्टम कम लागत और अधिक लचीलेपन के कारण दुनिया भर में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं और भविष्य में ये उपग्रह प्रणालियों के प्रभावी पूरक के रूप में उभर सकते हैं।
 

 

With inputs from IANS

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