एल्गोरिदम आधारित सोशल मीडिया कैसे बना रहा है Gen Z को फेक कंटेंट का आसान निशाना?By Admin Sun, 02 August 2026 08:57 PM

नई दिल्ली: भारत में 14 से 29 वर्ष आयु वर्ग, जिसे आमतौर पर जेनरेशन Z (Gen Z) कहा जाता है, की आबादी लगभग 40.7 करोड़ है, जो देश की कुल आबादी का करीब 28 प्रतिशत है। संयुक्त राष्ट्र के World Population Prospects के आंकड़ों के अनुसार, आने वाले वर्षों में यही वर्ग देश का सबसे बड़ा मतदाता समूह होगा। हालांकि, सोशल मीडिया पर इसकी बढ़ती निर्भरता इसे फर्जी सूचनाओं और ऑनलाइन प्रचार का आसान लक्ष्य भी बना सकती है।

इंडियन नैरेटिव में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि Indian Institute of Management Rohtak के एक अध्ययन के अनुसार 18 से 25 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 39,000 युवाओं का औसत स्क्रीन टाइम प्रतिदिन करीब सात घंटे है, जिसमें अधिकांश समय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बीतता है।

लेख के अनुसार, सोशल मीडिया के एल्गोरिदम वास्तविकता को निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत नहीं करते, बल्कि उनका उद्देश्य उपयोगकर्ताओं को अधिक समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखना होता है ताकि अधिक विज्ञापन दिखाए जा सकें। इसलिए वे अक्सर सनसनीखेज, भावनात्मक और ध्रुवीकरण वाले कंटेंट को प्राथमिकता देते हैं।

सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल अभय कृष्ण ने लेख में लिखा है कि एल्गोरिदम आधारित सोशल मीडिया सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित कर सकता है, असुविधाजनक सूचनाओं को दबा सकता है और कई बार वास्तविक दुनिया में राजनीतिक तनाव या हिंसा को भी बढ़ावा दे सकता है। उनके अनुसार, ये प्लेटफॉर्म आज के दौर के सबसे प्रभावशाली प्रचार माध्यम बन चुके हैं।

लेख में अमेरिका के Twitter Files का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें दावा किया गया था कि Hunter Biden से जुड़ी खबरों के प्रसार पर कंपनी की आंतरिक नीतियों और बाहरी सरकारी दबाव का असर पड़ा। इसी तरह Meta Platforms पर भी अपने एल्गोरिदम के जरिए अधिक सहभागिता पाने के लिए विवादास्पद और हानिकारक सामग्री को बढ़ावा देने के आरोप लग चुके हैं।

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लेख के मुताबिक, म्यांमार में फेसबुक के रिकमेंडेशन सिस्टम ने रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। संयुक्त राष्ट्र के जांचकर्ताओं और Amnesty International की रिपोर्टों में भी इस संबंध में गंभीर चिंताएं जताई गई थीं।

लेख में यह भी कहा गया है कि सोशल मीडिया के जरिए बड़े पैमाने पर भावनाओं को प्रभावित करने की प्रवृत्ति नई नहीं है। अरब स्प्रिंग से लेकर नेपाल और बांग्लादेश के आंदोलनों तक, डिजिटल प्लेटफॉर्म ने जनभावनाओं को संगठित करने और आंदोलनों को गति देने में अहम भूमिका निभाई।

भारत के संदर्भ में लेख में कहा गया है कि नीट पेपर लीक विरोध प्रदर्शनों के दौरान इंस्टाग्राम रील्स, एआई-निर्मित वीडियो और प्रभावशाली सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से आंदोलन को व्यापक स्तर पर पहुंचाया गया। लेख में यह भी दावा किया गया है कि कुछ भ्रामक और डीपफेक सामग्री का संबंध विदेशी खातों से जोड़ा गया, जिसने युवाओं के साथ-साथ आम लोगों की भावनाओं को भी प्रभावित किया।

लेख का निष्कर्ष है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पूर्ण प्रतिबंध व्यावहारिक समाधान नहीं होगा। इसके बजाय कानूनी प्रावधानों, आर्थिक उपायों, डिजिटल अवसंरचना और प्रभावी सूचना तंत्र के माध्यम से ऐसे प्लेटफॉर्म की जवाबदेही सुनिश्चित करने की रणनीति अपनाने की आवश्यकता है।

 

With inputs from IANS