
नई दिल्ली। भारत के तेजी से बढ़ते सौर विनिर्माण क्षेत्र ने चीन में भी चर्चा तेज कर दी है। चीनी सोशल मीडिया पर भारत की बढ़ती फोटोवोल्टिक (पीवी) उत्पादन क्षमता को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ यूजर्स इसे सौर उद्योग में चीन के लंबे समय से चले आ रहे दबदबे के लिए नई चुनौती के रूप में देख रहे हैं।
चीनी सोशल मीडिया पर भारत के बढ़ते सौर विनिर्माण को लेकर ‘चीन का फोटोवोल्टिक स्टेलिनग्राद’ और ‘भारत ने भीतर से चीन के फोटोवोल्टिक किले को भेद दिया’ जैसे वाक्यांश चर्चा में हैं। इन टिप्पणियों के जरिए यूजर्स भारत की बढ़ती उत्पादन क्षमता और चीनी सौर कंपनियों पर पड़ रहे दबाव को लेकर अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं।
भारत के सौर विनिर्माण क्षेत्र में तेजी से हो रहे विस्तार को लेकर एक्स पर साझा की गई पोस्टों ने भी इस चर्चा को हवा दी है। कुछ पोस्ट में भारत में सौर उपकरणों के विनिर्माण में हुई तेज वृद्धि और कई बड़ी चीनी फोटोवोल्टिक कंपनियों को हो रहे नुकसान का उल्लेख किया गया है।
एक एक्स यूजर ने लिखा कि भारत के सौर विनिर्माण में तेजी से बढ़ोतरी से जुड़ी पोस्ट चीनी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। उसने इसे ‘चीन के फोटोवोल्टिक क्षेत्र का स्टेलिनग्राद’ बताते हुए कहा कि भारत ने चीन के सौर विनिर्माण के किले में भीतर से सेंध लगा दी है।
एक अन्य पोस्ट में दावा किया गया कि 2018 के बाद से भारत की सौर घटक विनिर्माण क्षमता में करीब 17 गुना वृद्धि हुई है। पोस्ट में इस विस्तार को चीन की प्रमुख सौर कंपनियों पर बढ़ते दबाव और उनके सामने आ रही वित्तीय चुनौतियों से भी जोड़ा गया।
एक अन्य यूजर ने भारत की बढ़ती भूमिका की तुलना द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान स्टेलिनग्राद की लड़ाई से करते हुए भारत को ‘सौर विनिर्माण के क्षेत्र में हमारा स्टेलिनग्राद’ बताया। स्टेलिनग्राद की लड़ाई में सोवियत सेना ने जर्मन सेना को घेरकर निर्णायक शिकस्त दी थी।
भारत की सौर विनिर्माण क्षमता में हुई यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब देश घरेलू स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों के उत्पादन को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में लगातार कदम उठा रहा है।
चीनी सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं में उद्धृत आंकड़ों के मुताबिक, भारत की फोटोवोल्टिक मॉड्यूल उत्पादन क्षमता 2018 में 10 गीगावाट से भी कम थी, जो 2026 में बढ़कर करीब 172 गीगावाट हो गई है। यानी आठ वर्षों में इसमें लगभग 17 गुना वृद्धि दर्ज की गई है।
भारत की यह छलांग वैश्विक सौर विनिर्माण परिदृश्य में बदलाव का संकेत भी देती है। हालांकि चीन अब भी सौर आपूर्ति श्रृंखला के कई महत्वपूर्ण हिस्सों में बेहद मजबूत स्थिति रखता है, लेकिन भारत की बढ़ती घरेलू उत्पादन क्षमता उसे वैश्विक स्तर पर एक उभरते प्रतिस्पर्धी के रूप में स्थापित कर रही है।
सोशल मीडिया पर चल रही बहस इसी बदलते समीकरण को लेकर चीन में बढ़ती दिलचस्पी और चिंता को दर्शाती है।
With inputs from IANS