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जलवायु परिवर्तन का असर अब भारत के छोटे पैमाने पर मछली पकड़ने वाले मछुआरा समुदायों की रोजी-रोटी पर साफ दिखाई देने लगा है। बढ़ता तापमान, समुद्र का उग्र होना, तेज तूफान और मानसून के बदलते मिजाज के कारण मछुआरों के समुद्र में जाने के दिनों के साथ-साथ मछलियों की पकड़ भी प्रभावित हो रही है। एक नए आकलन में इसे छोटे मछुआरों के लिए बड़ी चुनौती बताया गया है।
बंगाल की खाड़ी कार्यक्रम अंतर-सरकारी संगठन (बीओबीपी-आईजीओ) ने राष्ट्रीय विशेषज्ञों के सहयोग और खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के तकनीकी मार्गदर्शन में यह आकलन तैयार किया है। इसमें जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं से जुड़े जोखिमों को छोटे पैमाने के मछुआरा समुदायों के सामने मौजूद प्रमुख चिंताओं में शामिल किया गया है।
यह आकलन ऐसे समय सामने आया है जब भारत छोटे पैमाने के मत्स्य क्षेत्र के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना (एनपीओए-एसएसएफ) तैयार करने के अगले चरण में पहुंच गया है। प्रस्तावित राष्ट्रीय योजना का मसौदा 21 नवंबर तक तैयार होने की उम्मीद है।
रिपोर्ट के अनुसार, मछुआरे अपने आसपास के मौसम और समुद्री परिस्थितियों में हो रहे बदलावों को महसूस कर रहे हैं। उन्होंने बढ़ते तापमान, मौसम के बदलते चक्र और पहले की तुलना में अधिक शक्तिशाली तूफानों की जानकारी दी है। मानसून का अनिश्चित होता स्वरूप भी उनके लिए परेशानी बढ़ा रहा है।
मछलियों की उपलब्धता में बदलाव एक और बड़ी समस्या बनकर उभरा है। मछुआरों ने समुद्र में विभिन्न प्रजातियों की मौजूदगी में बदलाव और कुछ पारंपरिक मछलियों की पकड़ में कमी की बात कही है। इनमें सार्डिन जैसी महत्वपूर्ण मछली की घटती उपलब्धता भी शामिल है।
जलवायु परिवर्तन का सीधा असर इस बात पर भी पड़ रहा है कि मछुआरे कितने दिन समुद्र में जाकर मछली पकड़ सकते हैं। खराब समुद्री स्थिति, चक्रवात और समुद्री तूफानों के कारण कई बार नावों को लगातार कई दिनों तक तट पर खड़ा रखना पड़ता है।
छोटे मछुआरों के लिए समुद्र में जाने का एक-दो दिन भी छूट जाना महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि उनकी आमदनी काफी हद तक रोजाना की पकड़ पर निर्भर रहती है। लंबे समय तक समुद्र में न जा पाने की स्थिति में परिवार की आय, भोजन और दूसरे जरूरी खर्चों पर सीधा असर पड़ सकता है।
रिपोर्ट ने यह भी रेखांकित किया है कि देश के सभी मछुआरा समुदाय जलवायु जोखिमों से समान रूप से प्रभावित नहीं होते। जोखिम का स्तर मछली पकड़ने वाली नाव और अन्य साधनों के प्रकार, बुनियादी ढांचे तक पहुंच तथा परिवार की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। किसी आपदा के बाद परिवार कितनी जल्दी अपनी आजीविका दोबारा शुरू कर पाता है, यह भी उसकी संवेदनशीलता को तय करता है।
बीओबीपी-आईजीओ के निदेशक डॉ. पी. कृष्णन ने कहा कि छोटे पैमाने के मछुआरों की समस्याओं पर विचार करते समय जलवायु से जुड़े जोखिमों को अन्य चुनौतियों के साथ प्राथमिकता से संबोधित करना जरूरी है।
आकलन में इस क्षेत्र की पुरानी समस्याओं की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। इनमें बाजार तक सीमित पहुंच, मछलियों के भंडारण और प्रसंस्करण की अपर्याप्त सुविधाएं तथा पकड़ी गई मछलियों का उचित मूल्य हासिल करने में आने वाली कठिनाइयां शामिल हैं।
समुद्र में सुरक्षा भी एक गंभीर मुद्दा है। बड़ी संख्या में छोटे मछुआरों के पास पर्याप्त सुरक्षा उपकरण और समय पर मौसम संबंधी जानकारी उपलब्ध नहीं होती। मछली पकड़ने के बंदरगाहों और मछली उतारने वाले केंद्रों के बुनियादी ढांचे में सुधार की भी जरूरत बताई गई है।
रिपोर्ट ने मछुआरा समुदायों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को भी रेखांकित किया है। मछली पकड़ने के बाद की गतिविधियों और इससे जुड़े कई कामों में महिलाएं अहम योगदान देती हैं, लेकिन निर्णय लेने और मत्स्य संसाधनों के प्रबंधन से जुड़ी प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी अभी भी सीमित है।
आकलन में मछली पकड़ने वाले इलाकों में आपदा प्रबंधन से जुड़े बुनियादी ढांचे का देशव्यापी ऑडिट कराने की सिफारिश की गई है। इसके अलावा, जलवायु और आपदा की दृष्टि से संवेदनशील तटीय क्षेत्रों की पहचान तथा आपदा के बाद मुआवजा देने की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने पर भी जोर दिया गया है।
रिपोर्ट में मजबूत और सुरक्षित नावों को बढ़ावा देने, मौसम पूर्वानुमान को बेहतर बनाने, आपदा के बाद सहायता व्यवस्था मजबूत करने, मछुआरों के कौशल विकास और वैकल्पिक आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने की भी सिफारिश की गई है।
इन सिफारिशों को प्रस्तावित राष्ट्रीय कार्ययोजना में शामिल किए जाने की उम्मीद है। इस योजना का उद्देश्य भारत के छोटे पैमाने के मछुआरा समुदायों के सामने मौजूद आर्थिक, सामाजिक और जलवायु संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए एक व्यापक ढांचा तैयार करना है।