भूतापीय ऊर्जा से भारत के नेट-जीरो लक्ष्य को मिल सकती है नई रफ्तारBy IANS Fri, 04 September 2026 07:56 PM

Photo: IANS

भारत के 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में भूतापीय ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा के एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में उभर रही है। लद्दाख में देश के पहले दो भूतापीय कुओं का हालिया संचालन इस क्षेत्र में भारत की नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।

भूतापीय ऊर्जा पृथ्वी की सतह के नीचे मौजूद प्राकृतिक गर्मी से प्राप्त होती है। सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह कम-कार्बन ऊर्जा का ऐसा स्रोत है, जो मौसम और दिन-रात के बदलाव से प्रभावित हुए बिना लगातार उपलब्ध रह सकता है।

इस क्षमता को देखते हुए केंद्र सरकार ने सितंबर 2025 में राष्ट्रीय भूतापीय ऊर्जा नीति अधिसूचित की थी। नीति के तहत देश में भूतापीय संसाधनों की खोज और उनके विकास के लिए एक स्पष्ट रूपरेखा तैयार की गई है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय इसके कार्यान्वयन के लिए नोडल मंत्रालय है।

लद्दाख में शुरू हुआ देश का पहला बड़ा प्रयोग

जुलाई 2026 में भारत ने भूतापीय ऊर्जा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की, जब ओएनजीसी एनर्जी सेंटर ने लद्दाख की पुग्गा घाटी में देश के पहले दो भूतापीय कुओं को चालू किया।

समुद्र तल से 14,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित पुग्गा घाटी अपने गर्म जलस्रोतों और भूमिगत तापीय संसाधनों के लिए जानी जाती है और इसे देश के प्रमुख भूतापीय क्षेत्रों में माना जाता है।

इन दोनों कुओं की गहराई 1,000 मीटर है और इनका इस्तेमाल भूमिगत भूतापीय जलाशय के मूल्यांकन के लिए किया जाएगा। यह परियोजना भारत के पहले 1 मेगावाट क्षमता वाले प्रदर्शनात्मक भूतापीय बिजली संयंत्र की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।

कैसे बनती है भूतापीय ऊर्जा

भूतापीय बिजली उत्पादन में पृथ्वी के भीतर मौजूद गर्म पानी और भाप को गहरे कुओं के माध्यम से सतह पर लाया जाता है। इस भाप से टर्बाइन चलाया जाता है, जो जनरेटर के जरिए बिजली पैदा करता है।

इस प्रक्रिया की तुलना पारंपरिक ताप विद्युत उत्पादन से की जा सकती है, लेकिन इसमें कोयले या अन्य ईंधन को जलाने के बजाय पृथ्वी के भीतर मौजूद प्राकृतिक गर्मी का इस्तेमाल किया जाता है।

बिजली उत्पादन के बाद इस्तेमाल किए गए पानी को दोबारा जलाशय में पहुंचाया जाता है। इससे संसाधन के पुनर्भरण में मदद मिलती है और लंबे समय तक ऊर्जा उत्पादन जारी रखने की संभावना बढ़ती है।

बिजली के अलावा भी कई उपयोग

भूतापीय ऊर्जा का इस्तेमाल केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसका उपयोग जिला-स्तरीय ताप आपूर्ति, कृषि, मत्स्य पालन और जलीय कृषि, भवनों को गर्म रखने तथा शीतलन जैसी जरूरतों में भी किया जा सकता है।

भारत की विविध भूगर्भीय संरचना भूतापीय ऊर्जा के विकास के लिए व्यापक संभावनाएं उपलब्ध कराती है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने देशभर में 381 गर्म जलस्रोतों का मानचित्रण किया है और 10 प्रमुख भूतापीय प्रांतों की पहचान की है।

देश में भूतापीय ऊर्जा की सैद्धांतिक क्षमता करीब 10.6 गीगावाट यानी 10,600 मेगावाट आंकी गई है। इनमें से 42 स्थलों को बिजली उत्पादन और प्रत्यक्ष ताप उपयोग के लिए संभावनाशील माना गया है।

भारत के 10 प्रमुख भूतापीय प्रांतों में हिमालयी भूतापीय प्रांत, नागा-लुशाई, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, सोन-नर्मदा-ताप्ती, पश्चिमी तट, कैंबे ग्रैबेन, अरावली, महानदी, गोदावरी और दक्षिण भारतीय क्रेटोनिक क्षेत्र शामिल हैं।

पायलट परियोजनाओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बढ़ने के साथ भूतापीय ऊर्जा का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के अलावा ताप आपूर्ति, भू-पर्यटन और कृषि जैसे क्षेत्रों में भी बढ़ने की संभावना है।

सरकार के अनुसार, भूतापीय ऊर्जा भारत के नवीकरणीय ऊर्जा मिश्रण में एक भरोसेमंद और स्वदेशी विकल्प जोड़ सकती है तथा देश की दीर्घकालिक स्वच्छ ऊर्जा यात्रा को मजबूती दे सकती है।