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अमेरिका ने चंद्रमा पर अपनी मौजूदगी बढ़ाने और भविष्य में वहां स्थायी ठिकाना बनाने की दिशा में परमाणु ऊर्जा तकनीक पर काम तेज कर दिया है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और ऊर्जा विभाग ने अंतरिक्ष यानों के लिए परमाणु ऊर्जा एवं प्रणोदन प्रणाली विकसित करने और चंद्रमा पर बिजली उपलब्ध कराने की योजनाओं को गति देने के लिए एक समझौता किया है। इसके तहत 2028 में अंतरिक्ष रिएक्टर से जुड़ा मिशन लॉन्च करने और भविष्य में चंद्रमा पर परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की तैयारी है।
दोनों एजेंसियों के बीच गुरुवार को वॉशिंगटन में हुए इस समझौते का उद्देश्य परमाणु ईंधन के विकास, उन्नत अनुसंधान, परीक्षण, प्रक्षेपण संबंधी तैयारियों और संचालन के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना है। नासा के प्रशासक जेरेड आइजैकमैन और अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने 'एक्सेलरेटिंग अमेरिकन लीडरशिप इन स्पेस न्यूक्लियर पावर एंड प्रोपल्शन' शीर्षक वाले समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता 1 नवंबर से प्रभावी होगा।
आइजैकमैन ने इसे अंतरिक्ष अन्वेषण में बड़े बदलाव की शुरुआत बताते हुए कहा कि परमाणु ऊर्जा से अंतरिक्ष यान अधिक दूर तक जा सकेंगे, लंबे समय तक काम कर पाएंगे और पहले की तुलना में अधिक सक्षम वैज्ञानिक उपकरणों का इस्तेमाल संभव होगा। उनके अनुसार, यह सहयोग भविष्य में परमाणु विखंडन से संचालित अंतरिक्ष यानों के विकास और वैज्ञानिक खोजों के नए अवसर तैयार करेगा।
समझौते के तहत दोनों एजेंसियां अंतरिक्ष में परमाणु तकनीक के विकास से लेकर उसके व्यावहारिक इस्तेमाल तक मिलकर काम करेंगी। कार्यक्रम में सुरक्षा को प्रमुख प्राथमिकता देने की बात भी कही गई है।
2028 में स्पेस रिएक्टर मिशन की योजना
नासा की योजना 2028 में स्पेस रिएक्टर-1 फ्रीडम (Space Reactor-1 Freedom) मिशन लॉन्च करने की है। इसका उद्देश्य परमाणु ऊर्जा से संचालित अंतरिक्ष तकनीक को प्रयोगशाला और अनुसंधान के स्तर से आगे बढ़ाकर वास्तविक अंतरिक्ष अभियानों में इस्तेमाल के योग्य बनाना है।
यह मिशन लूनर रिएक्टर-1 (Lunar Reactor-1) नामक एक अन्य परियोजना के विकास में भी मदद करेगा। इस परियोजना के तहत चंद्रमा की सतह पर बिजली पैदा करने के लिए परमाणु विखंडन आधारित ऊर्जा प्रणाली विकसित की जानी है। इसका लक्ष्य भविष्य में चंद्रमा पर बनने वाले अमेरिकी ठिकाने को लगातार बिजली उपलब्ध कराना है।
चंद्रमा पर परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि वहां कई स्थानों पर लंबे समय तक अंधेरा रहता है। विशेष रूप से ध्रुवीय क्षेत्रों में मौजूद कुछ स्थानों पर सूर्य का प्रकाश बेहद सीमित या बिल्कुल नहीं पहुंचता। ऐसे में सौर ऊर्जा पर निर्भर रहना मुश्किल हो सकता है। इसके विपरीत, परमाणु रिएक्टर लंबे समय तक बिजली उपलब्ध करा सकता है।
नासा के मुताबिक, चंद्रमा पर मानव गतिविधियों को लंबे समय तक जारी रखने के लिए आवास, संचार प्रणाली, वैज्ञानिक उपकरणों, रोवर और अन्य बुनियादी ढांचे को ऊर्जा की जरूरत होगी। परमाणु ऊर्जा इन आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। भविष्य में मंगल ग्रह पर होने वाले अभियानों में भी ऐसी तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है, जहां ऊर्जा की उपलब्धता अंतरिक्ष यान और सतह पर संचालित उपकरणों के लिए बड़ी चुनौती होगी।
2030 तक चंद्रमा पर रिएक्टर विकसित करने का लक्ष्य
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दिसंबर 2025 में एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत नासा को 2030 तक चंद्रमा की सतह पर स्थापित किए जा सकने वाले परमाणु रिएक्टर को लॉन्च के लिए तैयार करने का निर्देश दिया गया था। नासा और ऊर्जा विभाग के बीच हुआ ताजा समझौता इसी लक्ष्य की दिशा में दोनों एजेंसियों के सहयोग को मजबूत करेगा।
ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने कहा कि अमेरिका में परमाणु ऊर्जा के विकास का विस्तार अब अंतरिक्ष के नए क्षेत्रों तक पहुंच रहा है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा विभाग अमेरिकी अंतरिक्ष अभियानों को नई सीमाओं तक पहुंचाने के लिए नासा के साथ काम करने को तैयार है।
दोनों एजेंसियों का मानना है कि इन परियोजनाओं से अंतरिक्ष के लिए परमाणु तकनीक विकसित करने और उसकी आपूर्ति करने में सक्षम अमेरिकी औद्योगिक ढांचा तैयार करने में भी मदद मिलेगी।
टाइटन और मंगल अभियानों में भी इस्तेमाल होगी परमाणु तकनीक
नासा पहले से ही रेडियोआइसोटोप ऊर्जा प्रणालियों पर काम कर रहा है। इन प्रणालियों में रेडियोधर्मी पदार्थों के क्षय से पैदा होने वाली गर्मी का इस्तेमाल बिजली बनाने या उपकरणों को उचित तापमान पर बनाए रखने के लिए किया जाता है।
शनि के चंद्रमा टाइटन के अध्ययन के लिए नासा का ड्रैगनफ्लाई मिशन 2028 में लॉन्च करने की योजना है। इस मिशन में रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर और 24 हल्की हीटर इकाइयों का इस्तेमाल किया जाएगा। इनकी मदद से अंतरिक्ष यान को ऊर्जा मिलेगी और उसे अत्यधिक ठंडे वातावरण में काम करने के लिए गर्म रखा जा सकेगा। मिशन का उद्देश्य टाइटन के वातावरण और वहां जीवन के अनुकूल परिस्थितियों की संभावनाओं का अध्ययन करना है।
इसके अलावा, नासा और अमेरिकी ऊर्जा विभाग यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के रोजालिंड फ्रैंकलिन मंगल रोवर मिशन को भी सहयोग देने की योजना बना रहे हैं। इसके तहत वैज्ञानिक उपकरणों को मंगल की अत्यधिक ठंड से बचाने के लिए 24 रेडियोआइसोटोप हीटर इकाइयां उपलब्ध कराई जाएंगी।
नासा दशकों से उन अंतरिक्ष अभियानों में परमाणु ऊर्जा प्रणालियों का इस्तेमाल करता रहा है, जहां सौर ऊर्जा पर्याप्त नहीं होती या उसका उपयोग व्यावहारिक नहीं होता। अब चंद्रमा पर संभावित स्थायी ठिकाने और भविष्य के गहरे अंतरिक्ष अभियानों के लिए इन तकनीकों का विकास अंतरिक्ष अन्वेषण की दीर्घकालिक योजनाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है।