जिम्बाब्वे भारत के UPI सिस्टम को अपनाने की तैयारी में, अफ्रीका की भुगतान व्यवस्था में आ सकता है बड़ा बदलावBy IANS Sun, 11 October 2026 07:04 PM

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भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) अब अफ्रीका की भुगतान व्यवस्था को बदलने में अहम भूमिका निभा सकती है। एक रिपोर्ट के अनुसार, जिम्बाब्वे इस तकनीक को अपनाने के लिए भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) की अंतरराष्ट्रीय शाखा NPCI International Payments Ltd (NIPL) के साथ बातचीत कर रहा है।

भारत के UPI मॉडल पर आधारित साझा घरेलू भुगतान नेटवर्क बनने से जिम्बाब्वे में बैंक, मोबाइल मनी ऑपरेटर और फिनटेक कंपनियां एक ही सार्वजनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए तत्काल लेनदेन कर सकेंगी। इससे अलग-अलग भुगतान प्रणालियों के बीच तालमेल बढ़ने और लेनदेन की लागत घटने की उम्मीद है।

इंडिया नैरेटिव की रिपोर्ट के मुताबिक, जिम्बाब्वे के रिजर्व बैंक के गवर्नर जॉन मुशायावान्हु ने कहा है कि इस व्यवस्था से भुगतान तेज और सस्ता हो सकता है। साथ ही, छोटे घरेलू लेनदेन के लिए कार्ड आधारित भुगतान के विकल्प के रूप में सीधे बैंक खातों के बीच धन हस्तांतरण को बढ़ावा मिलेगा।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भविष्य में इस नेटवर्क का इस्तेमाल सीमा पार भुगतान और विदेशों से भेजी जाने वाली धनराशि के हस्तांतरण के लिए भी किया जा सकता है। NIPL के साथ बातचीत 31 अक्टूबर तक पूरी होने की संभावना जताई गई है।

जिम्बाब्वे में पहले से ही डिजिटल लेनदेन का व्यापक इस्तेमाल होता है, लेकिन विभिन्न भुगतान सेवाओं को जोड़ने वाला कम लागत का साझा नेटवर्क मौजूद नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, देश की राष्ट्रीय भुगतान प्रणाली ने 2025 की चौथी तिमाही में 23.8 करोड़ इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन दर्ज किए। इनमें मोबाइल मनी की हिस्सेदारी लगभग 87 प्रतिशत थी, जबकि सक्रिय मोबाइल वित्तीय सेवा उपयोगकर्ताओं की संख्या करीब 1.1 करोड़ थी।

विदेशों में रहने वाले जिम्बाब्वे के नागरिकों से आने वाली धनराशि भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में ऐसे प्रेषण बढ़कर 2.45 अरब डॉलर हो गए, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 2.15 अरब डॉलर था। इस तरह विदेशों से प्रतिदिन औसतन लगभग 67 लाख डॉलर की राशि देश में आई। शुरुआती 2025 के आंकड़ों के अनुसार, ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका प्रत्येक का योगदान कुल धन प्रवाह के एक-चौथाई से थोड़ा अधिक था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशों से आने वाली यह राशि परिवारों की आय और देश के लिए विदेशी मुद्रा का महत्वपूर्ण स्रोत है। खनन क्षेत्र के बाद इसे अर्थव्यवस्था के लिए अहम माना जाता है।

सीमा पार धन हस्तांतरण की ऊंची लागत भी अफ्रीकी देशों के सामने एक बड़ी चुनौती है। रिपोर्ट के अनुसार, विश्व बैंक ने 2025 में उप-सहारा अफ्रीका में 200 डॉलर भेजने की औसत लागत लगभग 8 प्रतिशत आंकी थी। इसकी तुलना में वैश्विक औसत करीब 6.5 प्रतिशत था, जबकि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में इसे घटाकर 3 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है। दक्षिणी अफ्रीकी विकास समुदाय (SADC) के देशों के बीच कुछ मार्गों पर लागत इससे भी अधिक बताई गई है।

भारत की UPI प्रणाली इस क्षेत्र के लिए एक संभावित मॉडल बनकर उभरी है। सरकारी आंकड़ों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 में वैश्विक रियल-टाइम भुगतान लेनदेन की मात्रा में UPI की हिस्सेदारी लगभग 49 प्रतिशत रही। वहीं, भारत में पिछले वित्त वर्ष के दौरान कुल डिजिटल भुगतान में इसकी हिस्सेदारी करीब 84 प्रतिशत थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, घाना, युगांडा, रवांडा और मोजाम्बिक जैसे अफ्रीकी देशों ने भी NPCI के साथ सहयोग में रुचि दिखाई है।

यदि जिम्बाब्वे और NIPL के बीच समझौता होता है, तो यह अफ्रीका में भारत की डिजिटल भुगतान तकनीक के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नई व्यवस्था मौजूदा मोबाइल मनी सेवाओं के साथ किस तरह काम करती है और आम लोगों तथा कारोबारियों के लिए भुगतान कितना सुलभ और किफायती बन पाता है।