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नीतिगत सुधारों और निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी के दम पर भारत का अंतरिक्ष उद्योग 2030 तक 40 से 45 अरब डॉलर का हो सकता है। तंजानिया स्थित समाचार पत्र ‘द गार्जियन’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, तेजी से हो रहे व्यावसायीकरण ने भारतीय अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के विकास की संभावनाओं को मजबूत किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का मौजूदा मूल्य लगभग 8.4 अरब डॉलर है। हालांकि, इस क्षमता को हासिल करने के लिए निरंतर निवेश, स्पष्ट नियामकीय व्यवस्था, बुनियादी ढांचे के विस्तार और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देना जरूरी होगा।
भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में बदलाव की शुरुआत 2020 में किए गए नीतिगत सुधारों से हुई, जिन्हें भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 के जरिए संस्थागत रूप दिया गया। इन सुधारों ने निजी कंपनियों के लिए अंतरिक्ष उद्योग के दरवाजे खोले और उन्हें उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण सेवाओं, रिमोट सेंसिंग तथा अंतरिक्ष आधारित संचार जैसे क्षेत्रों में काम करने का अवसर दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, पहले मुख्य रूप से सरकारी संस्थानों पर निर्भर रहने वाला यह क्षेत्र अब सरकारी एजेंसियों, निजी कंपनियों, शिक्षण संस्थानों, अनुसंधान केंद्रों और स्टार्टअप के सहयोगात्मक तंत्र में बदल रहा है।
इस व्यवस्था में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो), भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (इन-स्पेस) और न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) की भूमिकाओं को अलग-अलग निर्धारित किया गया है। इन-स्पेस निजी कंपनियों को परीक्षण सुविधाओं, प्रक्षेपण ढांचे, सार्वजनिक संसाधनों से जुटाए गए आंकड़ों और इसरो की विकसित तकनीकों तक पहुंच उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाता है।
रिपोर्ट में भारत के अंतरिक्ष स्टार्टअप तंत्र के विस्तार को भी रेखांकित किया गया है। इसके अनुसार, 2026 के मध्य तक लगभग 400 अंतरिक्ष स्टार्टअप इस क्षेत्र में सक्रिय हो चुके थे, जो देश की नवाचार आधारित अर्थव्यवस्था के तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में शामिल हैं।
स्टार्टअप को प्रोत्साहित करने के लिए सीड फंड योजना, मूल्य निर्धारण सहायता नीति, मार्गदर्शन कार्यक्रम, डिजाइन प्रयोगशालाएं, कौशल विकास, तकनीक हस्तांतरण और इसरो की सुविधाओं तक पहुंच जैसी पहल की गई हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इन पहलों ने निजी कंपनियों के लिए नए उत्पाद और तकनीक विकसित करने तथा स्वतंत्र व्यावसायिक रणनीतियों के साथ बाजार में उतरने के अवसर बढ़ाए हैं।
हालांकि, भारत के अंतरिक्ष उद्योग को 2030 तक अनुमानित 40-45 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंचाने के लिए नीतिगत निरंतरता, निवेश और तकनीकी क्षमताओं का विस्तार निर्णायक होगा।